Parliament session : भारत का लोकतंत्र संसद के इर्द-गिर्द घूमता है और संसद वह मंच है जहां सत्ता पक्ष को जवाब देना चाहिए तो विपक्ष को जवाबदेही तय करनी चाहिए. विपक्ष द्वारा जनता की आवाज उठाई जानी चाहिए तो सरकार को उसकी नीतियों पर बहस करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए. लेकिन बीते कुछ सालों में शायद यह पहली बार है जब मानसून सत्र इस लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की सबसे बड़ी नाकामी बनकर सामने आया है. अगर खबरों से वास्ता हो तो याद करिए 21 जुलाई से 21 अगस्त तक कोई ऐसा दिन जब आपने यह महसूस किया कि हमारे और आपके द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि काम तो छोड़िए कम से कम सदन की गरिमा ही बनाए रखें हो.
32 दिनों तक चले इस सत्र में लोकसभा के लिए 120 घंटे का समय तय था. लेकिन वास्तविक चर्चा महज़ 37 घंटे ही हो पाई. इनमें से भी अधिकांश समय ऑपरेशन सिंदूर पर बहस हुआ. हालांकि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्या, राज्यों के वित्तीय संकट, महिलाओं की सुरक्षा, वैश्विक हालात सहित बाकी दर्जनों ऐसे मुद्दे थे जिन पर संसद में गंभीर बहस होनी चाहिए थी लेकिन हुआ कुछ नहीं. हालांकि सरकार ने हंगामा कर रहे विपक्ष का फायदा उठाया और बिना पर्याप्त चर्चा के ही कई अहम विधेयक पारित कर दिए गए. अब सरकार के समर्थक एक बार को इसके लिए जश्न जरूर मना सकते हैं लेकिन हकीकत तो ये है कि लोकतंत्र में यह परंपरा ख़तरनाक है, क्योंकि संसद का काम केवल क़ानून पारित करना नहीं बल्कि चर्चा करके, टकराव झेलकर, सहमति बनाकर क़ानून पारित करना है.
एक तरफ सरकार तो दूसरी तरफ विपक्ष की भूमिका भी इस बार बेहद निराशाजनक रही. संसद के भीतर बहस करने के बजाय विपक्ष के सांसद संसद परिसर में नारेबाजी और फोटो-ऑप में ज्यादा सक्रिय दिखे. Vote Chori और SIR जैसे गंभीर मुद्दों पर अड़ी रही, हालांकि विपक्ष का यह रवैया इक तरफ विपक्षी एकता को प्रदर्शित कर रहा था तो दूसरी तरफ शायद वो भूल गए कि नारेबाजी से न तो कानून बदलते हैं और न ही सरकार जवाबदेह बनती है. जिसे जनता बड़े अच्छे से समझती है. विपक्ष भले ही गैर-गंभीर रहा, लेकिन सत्ता पक्ष का रवैया भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत देता है.
शोरगुल और नारेबाजी को बहाना बना कर बार-बार सदन स्थगित कराना, विपक्ष की मांगों को दरकिनार करना और बिना बहस विधेयक पारित करना , ये भी तो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ ही है. उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में अनुपस्थित रहना भी इस सत्र का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश रहा. ऑपरेशन सिंदूर पर जवाब देने आए प्रधानमंत्री के करीब सवा घंटा छोड़ दे तो पूरे कार्यवाही के दौरान पीएम की झलक तक न मिलना, यह बताता है कि सरकार संसद को प्राथमिकता नहीं दे रही. सत्र के दौरान पीएम का विदेश यात्राओं पर जाना भी प्रश्न खड़ा करता है.
2025 का मानसून सत्र यह साबित करता है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही जनता के भरोसे को ठग रहे हैं. सत्ता पक्ष संसद को अपनी राजनीतिक इच्छाओं का मंच बना चुका है और विपक्ष उसे अपने कैमरे का बैकड्रॉप. लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि संसद जनता की नज़र में अपनी विश्वसनीयता खो रही है. जब संसद बेअसर हो जाएगी, तब जनता सड़कों पर उतरेगी और लोकतंत्र का स्वरूप ही बदल जाएगा. ऐसे में सत्ता और विपक्ष दोनों को जवाब देना चाहिए कि आखिर संसद की गरिमा बहाल करने की जिम्मेदारी किसकी है…