बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे में उलझी NDA की  सियासत ?  

बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव 2025 की राजनीति को निर्णायक दिशा देने वाला होगा ऐसा इसलिए क्योंकि  इस बार का चुनावी समीकरण पहले से कहीं ज्यादा जटिल लग रहा है. एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी बिहार में अपने सहयोगियों के साथ वोटर अधिकार यात्रा के जरिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोज रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार में लगातार हो रहे दौरे के जरिए एनडीए के भीतर सियासी समीकरणों की पुनर्रचना हो रही है. उधर मीडिया रिपोर्ट की मानें तो NDA के बीच सीट शेयरिंग के फॉर्मूले में अब अंतिम दौर की चर्चा चल रही है.

रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार एनडीए के प्रमुख साझेदार बीजेपी और जेडीयू की बातचीत काफी करीब पहुंच चुकी है. 243 सीटों के इस राज्य में अनुमान है कि बीजेपी और जेडीयू समान रूप से 100 से 105 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जबकि चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को सिर्फ 20 सीटें मिल सकती हैं, जबकि उनकी पार्टी ने 40 सीटों की मांग की थी. हालांकि इस विभाजन में खासा संशय भी है क्योंकि लोजपा के नेता चिराग पासवान ने बीजेपी और जेडीयू के खिलाफ कई बार सार्वजनिक बयान दिए हैं ऐसे में कहा जा रहा है कि पार्टी की सियासी भूमिका थोड़ी कमजोर हो सकती है.

खबर तो ये भी है कि उपमुख्यमंत्री पद के रूप में लगातार उपेक्षित हो रहे मुकेश साहनी एक बार फिर से पाला बदल सकते है. अगर ऐसा होता है तो मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) का एनडीए में सीटों के बंटवारे को प्रभावित कर सकता है. यदि वीआईपी एनडीए में शामिल होती है तो समीकरण बदल सकते हैं. जैसा कि 2020 के विधानसभा चुनाव में देखा गया था, जब वीआईपी, हम (एस) और लोजपा समेत कई छोटे सहयोगी दल एनडीए का हिस्सा थे,तो सीटों का बंटवारा उतना सहज नहीं था. हालांकि इसकी संभावना कम ही दिखती है.

बीजेपी के साथ जेडीयू का संबंध इस बार थोड़ी जटिल स्थिति में है. 2020 में जेडीयू की सीटों में भारी गिरावट आई थी और इसका मुख्य कारण था लोजपा द्वारा उसके खिलाफ उम्मीदवार उतारना. जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं का यह मानना है कि 2025 में पार्टी को 100 से कम सीटों पर संतुष्ट नहीं किया जा सकता. दरअसल, उनकी नजर में बिहार की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण फैसला नीतीश कुमार के नेतृत्व में होगा और उसी के अनुसार चुनावी प्रचार होगा. फिर भी इन सबके बाद भी सहयोगी दलों के बीच समायोजन की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता.

जानकारी के लिए बता दें कि सबसे बड़ी बात जो  NDA के बीच सीट शेयरिंग को जटिल बना रही है वो लोजपा (रामविलास) की मांग है. पार्टी ने 40 सीटों की मांग की है,जो बीजेपी और जेडीयू के लिए स्वीकार्य नहीं हो रही. पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी पांचों सीटों पर जीत हासिल की थी और लगभग 6% का वोट शेयर हासिल किया था,लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी की पकड़ पूरी तरह से कमजोर साबित हुई थी. 2020 के विधानसभा चुनाव में लोजपा ने 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे,लेकिन पार्टी को केवल एक ही सीट मिली थी. बावजूद इसके पार्टी का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके प्रदर्शन से उसे सीटों का बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए,लेकिन जेडीयू और बीजेपी के नेताओं का कहना है कि विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों और पार्टी की जमीनी ताकत का ही अहम रोल होता है.

इन तमाम समीकरणों और गतिरोध के बावजूद, यह कहना जल्दबाजी होगी कि  NDA के बीच सीट शेयरिंग फैसला कौन करने जा रहा है. बीजेपी-जेडीयू के बीच सीटों की बंटवारे के बाद भी, अगर लोजपा, वीआईपी या अन्य छोटे दलों को उचित स्थान नहीं मिलता,तो एनडीए की एकता पर खतरे में आ सकती है जैसा की चिराग ने हिंट दिया है.

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