130th Constitutional Amendment Bill : भारतीय लोकतंत्र में संसद और उसकी समितियां, विशेष रूप से संयुक्त संसदीय समिति (JPC) नीतिगत विमर्श का महत्वपूर्ण मंच हैं. संसद में प्रस्तावित विधेयकों पर चर्चा के लिए इसे उपयोग में लाया जाता है. इन दिनों यह एक बार फिर से चर्चा में है,जिसकी वजह है हाल ही में पेश हुए संविधान (130वां संशोधन)विधेयक-2025. संसद के मानसुन सत्र में प्रस्तावित इस विधेयक को सत्ताधारी पार्टी द्वारा जेल से सरकार नहीं बिल कहा जा रहा है. इसको लेकर विपक्ष जहां एक तरफ विरोध कर रहा है तो वहीं दूसरे तरफ कुछ बड़ी विपक्षी पार्टी द्वारा विधेयक पर चर्चा के लिए बनाए गए JPC से दूरी ने लोकतांत्रिक बहस की गंभीरता को कठघरे में खड़ा कर दिया है.
सबसे पहले ये जानते है कि विधेयक है क्या तो इस संविधान (130वां संशोधन)विधेयक-2025 में प्रस्ताव है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री किसी गंभीर अपराध (जिसमें सजा 5 वर्ष या उससे अधिक हो) के मामले में 30 दिन से अधिक जेल में रहते हैं, तो उन्हें स्वतः पद से हटा दिया जाएगा. एक तरफ इसे सत्ता पक्ष भ्रष्टाचार विरोधी कदम बता रहा है तो कई विपक्षी दल विशेषकर कांग्रेस, टीएमसी, समाजवादी पार्टी और आप इसे विपक्ष को कुचलने के लिए सरकार की रणनीति बता रहे हैं.
हालांकि सवाल विपक्ष के रवैये को लेकर है.क्योंकि इस प्रस्तावित विधेयक का विपक्ष द्वारा विरोध तो किया जा रहा है लेकिन इसके साथ साथ बड़ी विपक्षी पार्टी प्रस्तावित संविधान (130वां संशोधन)विधेयक-2025 पर चर्चा के लिए बनाई जाने वाली JPC में भाग लेना भी नहीं चाहती. तो सवाल यह है कि क्या संसदीय प्रक्रिया से भागना ही इसका समाधान है?
टीएमसी के नेता डेरेक ओ’ब्रायन इसे सुपर-इमरजेंसी बताते हैं और अखिलेश यादव ने भी इस विधेयक को लोकतंत्र के लिए खतरा कहा है. उनका तर्क है कि NDA के बहुमत के चलते JPC की कार्यवाही निष्पक्ष नहीं होगी. लेकिन क्या बहुमत संसदीय प्रणाली की एक बुनियादी सच्चाई नहीं है? अगर यही तर्क मान लिया जाए तो फिर भविष्य में कोई भी विपक्ष किसी भी समिति में भागीदारी से इनकार कर सकता है .जेपीसी का मंच उस विरोध को दर्ज करने का संवैधानिक व प्रभावशाली जरिया है जिसे सड़क पर शोरगुल या मीडिया बाइट्स से नहीं समझाया जा सकता. समिति की रिपोर्टें केवल कागज भर नहीं होतीं, ये अदालतों, जनमत और भविष्य की विधायी नीतियों को भी प्रभावित करती हैं. ऐसे में सवाल उठता है यदि कोई विधेयक तानाशाही की राह खोलता है, तो क्या उसका विरोध समिति के भीतर नहीं होना चाहिए?
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने गंभीर मुद्दों पर संसदीय या संवैधानिक प्रक्रियाओं से किनारा किया है इससे पहले EVM विवाद ,पेगासस जासूसी मामला,SIR (Special Intensive Revision) मुद्दा आदि ये ऐसे मामले है जहां विपक्ष आरोप तो लगाता रहा है लेकिन जब सबूत पेश करने की बारी आई तो पिछे हट गई. तो क्या यह मान लिया जाए कि हर बार राजनीतिक लाभ के कारण विपक्ष ने संवैधानिक लड़ाई को पीछे छोड़ दिया ? विपक्ष अकसर दलील देता है कि वह सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ेगा. लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह नारा उल्टा होता दिख रहा है, क्योंकि विपक्ष सड़क पर शोर तो मचा रही है इसके साथ साथ संसद से भी बच रही है. क्योंकि विधेयक की आलोचना जरूरी है और उसका विरोध आवश्यक है. परंतु अगर विपक्ष उसे तानाशाही की ओर ले जाने वाला मानता है, तो सबसे पहले उसे विधायी प्रक्रिया में चुनौती देनी चाहिए. संविधान (130वां संशोधन)विधेयक-2025 विवादास्पद है इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन लोकतंत्र में विरोध का पहला और सबसे वैध मंच संसद और उसकी समितियां हैं. सड़क की राजनीति आवश्यक हो सकती है, लेकिन वह तभी असरदार होती है जब उसे संसद की गरिमा और प्रक्रिया का समर्थन मिले.
हालांकि इस मुद्दे पर कांग्रेस ने भी तक JPC से खुद को अलग नहीं किया है, लेकिन दूसरे दलों का किनारा कर लेना बताता है कि विपक्षी एकजुटता अभी भी महज चुनौती भर है. JPC से खुद को अलग नहीं करना कांग्रेस का रुख अपेक्षाकृत परिपक्व और रणनीतिक होने का संकेत प्रतित होता है. जो यह भी दिखाता है कि कांग्रेस समझती है कि संसदीय लड़ाई ही लोकतंत्र की असली लड़ाई है. हालांकि,इंडिया गठबंधन में सहयोगी दलों के दबाव में वह कब तक टिकेगी,यह कहना भी मुश्किल है.इसके साथ साथ टीएमसी और सपा जैसे दलों को भी इस बात को समझना होगा कि JPC से दूरी बनाकर वे न केवल सरकार को खुली छूट दे रहे हैं, बल्कि विपक्षी एकता को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं. कांग्रेस, DMK, NCP (SP), RJD और JMM जैसे दलों के साथ मिलकर अगर विपक्ष JPC में अपनी बात मजबूती से रखे, तो यह सरकार के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर सकता है.
अपनी लाठी को और मजबूत कर रही है केंद्र सरकार..! क्या लोकतंत्र की कसौटी पर खरा उतरेगा नया बिल