यात्रा के दौरान राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अन्य विपक्षी नेता मोदी सरकार पर जमकर हमले करते रहे और आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट से नाम काटने के जरिए लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है. राहुल गांधी ने बार-बार ‘वोट चोरी’ की बात उठाई और जनता को इसके खिलाफ जागरूक करने का प्रयास किया. उनके बयान में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीखा विरोध था. तेजस्वी यादव ने तो यहां तक कहा कि बिहार के लोग बदलाव के लिए तैयार हैं और नीतीश कुमार की सरकार को चुनौती दी.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस यात्रा ने विपक्ष के सियासी समीकरण को उजागर किया. यात्रा के दौरान राहुल और तेजस्वी के साथ अखिलेश यादव का मंच साझा करना यह भी संकेत करता है कि क्या बिहार में विपक्ष MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण से PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की ओर बढ़ने की दिशा में है? क्या इस यात्रा के जरिए विपक्ष ने अपने सामाजिक-राजनीतिक समीकरण को साधने की कोशिश की? या फिर यह सिर्फ एक चुनावी रणनीति का हिस्सा था?
यह यात्रा अपने आप में कई संदेश लेकर आई है. एक ओर जहां विपक्ष ने नरेंद्र मोदी की सरकार को कटघरे में खड़ा किया तो वहीं दूसरी ओर जनता के अधिकारों की रक्षा करने का दावा भी किया. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह यात्रा सच में वोटर के अधिकार की लड़ाई थी,या फिर नेताओं की राजनीति का हिस्सा ? क्या यह ‘वोट चोरी’ के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन था,या फिर बिहार में 35 सालों से अपना राजनीतिक जमीन तलाश रही कांग्रेस के राजनीतिक अस्तित्व को मजबूत करने की एक चाल?
बिहार की राजनीति में विपक्ष के इस आंदोलन को भले ही एक जन जागरूकता अभियान के रूप में देखा जा रहा हो, लेकिन इसकी असली परीक्षा 2025 के विधानसभा चुनाव में होगी. तब जनता तय करेगी कि इस यात्रा के माध्यम से दिए गए संदेशों का असर कितना वास्तविक था और किसे सत्ता में अधिकार मिलेगा. क्या यह यात्रा बिहार की जनता के अधिकारों के लिए लड़ी गई थी, या फिर नेताओं के राजनीतिक अधिकार के लिए एक साधन बनकर रह गई?
अंत में सवाल यह भी है कि यात्रा का मकसद पूरा हुआ या नहीं? विपक्ष ने महज बीजेपी के खिलाफ बिगुल बजाया या फिर वाकई में उसने जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए एक ठोस कदम उठाया? बिहार की राजनीति में यह यात्रा केवल एक शुरुआत हो सकती है,लेकिन असली इम्तिहान तो तब होगा,जब जनता अपनी वोटिंग शक्ति का उपयोग कर सत्ता का फैसला करेगी.