भारत में धार्मिक परंपराओं का गहरा जुड़ाव हमारी संस्कृति और जीवन शैली से रहा है । इन्हीं परंपराओं में से एक है हाथ पर कलवा (मौली) बांधना , बचपन से जब भी मंदिर जाते थे तो पंडित जी हमारी कलाई पर लाल पीले धागे से कलवा बांध देते थे हमेशा लोग इसे बस एक धार्मिक रस्म समझ कर चुपचाप बंधवा लेते हैं , लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर क्यों कलाई पर ही यह धागा बांधा जाता है और क्यों उसे इतना पवित्र माना गया है ।
परंपरा की डोर और विज्ञान की नजर
हिन्दू धर्म में कलावा को संरक्षण का प्रतीक कहा गया है पूजा व्रत हवन बिना कलवा बांधे अधूरा माना जाता है । पुरुष और अविवाहित लड़कियां इस दाहिने हाथ में जबकि विवाहित महिलाएं बाएं हाथ में बांधती है लाल रंग शक्ति और साहस का प्रतीक है यही पीला रंग मंगल और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है ।
कलवा बांधना आस्था विश्वास तक सीमित नहीं है कलाई पर धागे बांधने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है । कलाई में कई नर्व पॉइंट्स होते हैं यह धागा कसकर बढ़ने से ब्लड सर्कुलेशन और बेहतर होता है , एक्यूप्रेशर जैसा असर मिलता है जिससे तनाव और थकान कम होती है ।
कलवा कब होता है पुराना
कहा जाता है कि 21 दिन के बाद कलवा पुराना हो जाता है , यह इसका रंग फीका पड़ जाए धागा टूटने लगे या हाथ पर कसकर नहीं रहे इसके अलावा जब जी धार्मिक अवसर के लिए कलवा बांधा गया हो वह पूरा हो जाए जैसे व्रत , पूजा या हवन तो भी उसे पूर्ण माना जाता है । पुराना या टूटा हुआ कलवा पहने रहने से न सिर्फ उसकी पवित्रता चम हो जाती है बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका प्रभाव घट जाता है , क्योंकि कलाई के नर्व पॉइंट्स पर दबाव और ऊर्जा संतुलन बनाए रखने वाला असर अब सही से नहीं रह पाता , इसलिए इसे सामान पूर्वक काटकर बहते पानी में प्रवाहित करना यह पौधे के नीचे डालना उचित माना गया है ।