Patna Bengali Akhara: बिहार में दुर्गा पूजा सिर्फ त्यौहार नहीं हैं इस बात का जीवंत उदाहरण है पटना का सूर्योदयान पूजा सेलिब्रेशन कमेटी बंगाली अखाड़ा पिछले 129 सालों से यहां दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है , और इस वर्ष यह कमेटी अपनी 130वीं वर्षगांठ मना रही है धार्मिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व से भरपूर यहां दुर्गा पूजा अभी भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है ।
क्यों है खास बंगाली अखाड़ा
बंगाली अखाड़ा केवल पूजा का केंद्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों का भी स्थल रहा है राष्ट्रीय स्तर की वेटलिफ्टिंग बॉडी बिल्डिंग और पावरलिफ्टिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन भी यहां किया जाता है पटना का बंगाली अखाड़ा बिहार में दुर्गा पूजा की सांस्कृतिक इतिहास और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है । यहां की परंपरा यह दिखाती है कि धर्म संस्कृति और समुदाय का संगम कैसे एक जगह की पहचान को वैश्विक स्तर पर पहुंचा सकता है ।
रेलवे स्टेशन से पंडाल की शुरुआत
ब्रिटिश राज के समय बिहार और झारखंड के रेलवे नेटवर्क के विकास के बाद कई बंगाली कर्मचारी इन क्षेत्रों के रेलवे स्टेशनों पर तैनात किए गए थे । यही वजह है कि बिहार के कई शहरों में दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल और मूर्तियों की स्थापना रेलवे कॉलोनी और स्टेशनों से शुरू हुई और आज यह परंपरा आसपास के शहरों तक फैल गई है ।
बंगाली शैली में पंडाल और प्रतिमा
इस वर्ष पंडाल की ऊंचाई 35 फीट और चौड़ाई 50 फीट की जाएगी पंडाल का निर्माण पटना के कारीगर कर रहे हैं जबकि मां दुर्गा की प्रतिमा पश्चिम बंगाल के निमाई पाल की टीम द्वारा बनाई जा रही है प्रतिमा में मां की शक्ति रूप को दर्शाया जाएगा बंगाली डाक और पारंपरिक पंडाल पूजा की शोभा को बढ़ाते हैं ।
चार पीढ़ियों की परंपरा और योगदान
1896 में वकील विनोद बिहारी मजूमदार ने बंगाली अखाड़ा की भूमि पूजा कमेटी को दान में दे दिया था । इसके बाद से ही पूजा नियमित रूप से यहां आयोजित हो रही है शुरुआती दिनों में अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त बैठक भी इसी अखाड़े में होती थी कमेटी के प्रधान पुरोहित अशोक कुमार घोसला बताते हैं कि उनके परदादा से लेकर अब तक चार पीढ़ियों से उनका परिवार पूजा कर रहा है नवरात्रि के दौरान मांस मछली का सेवन नहीं किया जाता षष्ठी से कलश स्थापना होती है और पूरी नवरात्र व्रत को और उपवास का पालन किया जाता है ।