Bihar Assembly Election: जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे नजदीक आता जा रहा है वैसे-वैसे चुनावी गहमागहमी बढ़ रही है.इन दिनों बिहार की राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा जिस सीट को लेकर हो रही है वह है राघोपुर हालांकि चर्चें करहगर सीट की भी खुब हो रही है. राघोपुर वही सीट है जो राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का गढ़ है. यही वो सीट है जहां से नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव चुनाव लड़ते हैं और मौजूदा विधायक भी हैं.
इस हाई प्रोफाइल सीट के चर्चे तो आम बात है लेकिन हाल ही में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जब संकेत दिया कि वे राघोपुर से चुनावी अखाड़े में उतर सकते हैं तो यह चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.वैसे भी बिहार की राजनीति में मुकाबला सिर्फ चुनावी जंग नहीं या दो विचारधाराओं और दो अलग-अलग राजनीति की शैलियों का टकराव तक सीमित नहीं होता हैं.
जन्मभूमि और कर्मभूमि की बात कहते हुए प्रशांत किशोर ने अपने हालिया बयान में साफ करते हुए कहा कि राजनीति में चुनाव लड़ने के लिए दो ही जगहें मायने रखती हैं. ऐसे में जन्मभूमि के लिहाज से उनका नाता सासाराम (करहगर) से है तो उनके हिसाब से उनका कर्मभूमि अब पूरा बिहार नहीं बल्कि राघोपुर है.मतलब संकेत साफ है कि वो तेजस्वी यादव को सीधी चुनौती देने का मन बना चुके हैं. पीके पिछले कई महीनों से अपने भाषणों और जनसभाओं में तेजस्वी पर तीखा हमला बोलते रहे हैं. उनका तर्क है कि बिहार की मौजूदा राजनीति में पारंपरिक ताकतों को चुनौती दिए बिना कोई विकल्प खड़ा नहीं हो सकता. इस लिहाज से राघोपुर से चुनाव लड़ना प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है.
हालांकि प्रशांत किशोर द्वारा उनको लेकर दिए जा रहे बयानों को किनारा करते हुए तेजस्वी यादव ने इस चर्चा को हल्के अंदाज में लिया और कहा कि मीडिया नए दल और नेता को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दे रहा है. उन्होंने व्यंग्य करते हुए यहां तक कह दिया कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राघोपुर से चुनाव लड़ लें तो उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़नी होगी. आरजेडी के दूसरे नेताओं का भी मानना है कि बिहार में असली मुकाबला एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच है, बाकी चर्चाओं का ज्यादा महत्व नहीं है.
राघोपुर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं बल्कि लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक गढ़ का प्रतीक है. इस सीट से लालू और राबड़ी देवी दोनों चुनाव जीत चुके हैं. हालांकि 2010 में राबड़ी देवी को यहां हार का सामना करना पड़ा था. 2015 के चुनाव में राघोपुर से आरजेडी को 49.15% वोट मिले, जबकि भाजपा 36.9% वोट के साथ दूसरे स्थान पर रही. 2020 में भी तेजस्वी यादव ने 48.74% वोट हासिल किए और भाजपा को मात्र 29.64% वोट मिले. यह आंकड़े बताते हैं कि राघोपुर भले ही आरजेडी का गढ़ है, लेकिन भाजपा लगातार दूसरे नंबर पर रही है. ऐसे में पीके की एंट्री यहां के समीकरण को दिलचस्प बना सकती है. दूसरी ओर, करहगर (रोहतास) सीट का इतिहास अपेक्षाकृत छोटा है क्योंकि इसका गठन परिसीमन के बाद हुआ था. यहां से चुनाव लड़ने पर पीके को क्षेत्रीय पहचान का सहारा मिलेगा,लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जो प्रतीकात्मक संदेश वे देना चाहते हैं,वह शायद राघोपुर से ही संभव है.
अगर प्रशांत किशोर वास्तव में राघोपुर से चुनाव लड़ते हैं तो इसका असर कई स्तरों पर दिखेगा. यह पहली बार होगा जब तेजस्वी को अपने ही गढ़ में एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी से मुकाबला करना पड़ेगा जिसकी पहचान सिर्फ उम्मीदवार के तौर पर नहीं बल्कि चुनावी रणनीतिकार और वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश में लगे व्यक्ति के तौर पर है. परंपरागत यादव-मुस्लिम वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती आरजेडी की राजनीति को चुनौती देने के लिए पीके किस तरह नए सामाजिक समीकरण गढ़ते हैं, यह देखने लायक होगा. इसके साथ साथ यह लड़ाई बिहार से परे भी जाएगी. क्योंकि अगर पीके यहां अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो वे खुद को बिहार की राजनीति में एक गंभीर खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर पाएंगे.
बिहार की राजनीति लंबे समय से दो ध्रुवों एनडीए और आरजेडी केंद्रित इंडिया गठबंधन के बीच घूमती रही है. ऐसे में किसी तीसरी ताकत का उदय हमेशा मुश्किल रहा है. लेकिन राजनीति में असंभव कुछ नहीं होता. प्रशांत किशोर का चुनावी सफर सिर्फ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नहीं बल्कि बिहार की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की संभावना का भी इशारा है. सवाल यह है कि क्या वे जनता के बीच सिर्फ एक रणनीतिकार की छवि से बाहर निकलकर नेता के रूप में भरोसा जगा पाएंगे? राघोपुर की संभावित लड़ाई न सिर्फ तेजस्वी बनाम प्रशांत किशोर होगी बल्कि यह तय करेगी कि बिहार की राजनीति में नए विकल्प की गुंजाइश कितनी है.