Jitiya vrat: हर साल अश्विनी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मानने वाला यह व्रत संतान धर्म में बहुत खास माना जाता है. इस व्रत को जीवित्पुत्रिका के नाम से भी जाना जाता है. मुख्य रूप से बिहार झारखंड और पूर्वांचल में मानने वाला यह व्रत तीन दिनों तक चलता है जिसकी शुरुआत नहाए खाए से होती है.
क्यों मनाया जाता है जितिया व्रत?
संतान की लंबी आयु आरोग्य और सुख समृद्धि के लिए रखे जाने वाला यह व्रत काफी कठिन होता है. महिलाएं अपनी संतान के लिए रखती हैं जिससे सबसे महत्वपूर्ण दिन निर्जल उपवास का होता है जिसकी शुरुआत नहाए खाए से होती है और पारण के साथ समाप्त होता है. व्रत का दूसरा दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है जब महिलाएं 24 घंटे से अधिक समय तक बिना अन जल ग्रहण किया निर्जला व्रत रखती हैं. इस कठिन व्रत का प्रतीक है कि एक मां अपनी संतान की सलामती के लिए किसी भी हद तक जा सकती है इस व्रत का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि भावनात्मक भी है.
जितिया व्रत की पौराणिक कथाएं
पौराणिक कथाओं में के अनुसार दो कथाएं काफी प्रचलित है जैसे जीमूतवाहन की कथा और चील सियारिन की कथा. जीवित वहां का एक राजा था जो बहुत दयालु था उन्होंने अपने राजपाट त्याग कर वन में तपस्या करने का निर्णय लिया था. अपनी तपस्या के दौरान उन्होंने देखा कि नागवंश की एक वृद्ध महिला विलाप कर रही है पूछने पर उसने बताया कि वह एकमात्र पुत्र को गरुड़ को बलि देने जा रही है. क्योंकि गरुड़ को यह वरदान मिला था कि वह प्रतिदिन एक नाक का भक्षण कर सकता है. जीमूतवाहन से उसे मां का दुख देखा नहीं गया और स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया जब गरुड़ उन्हें खाने आया तो जीमूतवाहन ने उसे अपने बलिदान का कारण बताया राजा के साहस साहस से प्रश्न होकर गरुड़ ने उन्हें वरदान दिया. राजा ने एक मां के पुत्र की रक्षा की तभी से माएँ अपनी संतान की रक्षा के लिए जीमूतवाहन की पूजा करती है.
एक और बहुत ही प्रचलित कथा है कि एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहते थे दोनों ने मिलकर व्रत करने का फैसला लिया लेकिन व्रत के दिन कर एन भूख बर्दाश्त नहीं कर पाई और खाना खा लिया जबकि चल ने पूरी निष्ठा से व्रत का पालन किया. जब अगले जन्म में दोनों का पूर्व जन्म हुआ तो चल ने एक रानी के रूप में जन्म दिया और उसे कई पुत्रों का सुख प्राप्त हुआ वही सियारिन एक गरीब परिवार में जन्म मिला और उसके सारे पुत्रों की कम आयु में मृत्यु हो जाती थी.
जितिया व्रत की विधि और महत्व…..
जितिया व्रत की शुरुआत नहाए खाए से होती है जिसमें महिलाएं गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर सात्विक भोजन करती हैं दूसरे दिन भी निर्जला उपवास रखती हैं और जीमूतवाहन की पूजा करती हैं. इस व्रत का महत्व संतान की लंबी उम्र अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए किया जाता है माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना करते हुए निर्जला उपवास रखते हैं इस दिन महिलाएं जल तक का त्याग करती हैं यानी पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर भगवान की पूजा करते हैं यह व्रत विशेष रूप से मातृत्व और त्याग का प्रतीक माना जाता है.