Bihar elections : 70 नहीं इन 15 सीटों पर कांग्रेस ने उलझा रखी है महांगठबंधन की रणनीति..!

Bihar politics : बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और महागठबंधन में सीटों को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है. इस बार कांग्रेस ने अपनी ओर से 70 सीटें चिन्हित की हैं और अलग अलग मीडिया की रिपोर्ट ( Bihar Congress Internal Report ) बताती है कि पार्टी इन पर गहन मंथन कर चुकी है. मगर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का यह प्रयोग उसे फिर से बिहार की राजनीति में जगह दिला पाएगा या यह सिर्फ पुराने समीकरणों को दोहराने जैसा होगा?

गौरतलब है कि कांग्रेस ने 2020 में 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ 19 पर जीत पाई. 51 सीटों पर हार का ठीकरा उसके सिर पर फूटा और महागठबंधन के भीतर यह बहस चल पड़ी कि कांग्रेस को जरूरत से ज्यादा सीटें दी गईं. ऐसे में अब दावा किया जा रहा है कि पार्टी 15 पुरानी सीटें छोड़ रही है और 15 नई सीटों की मांग कर रही है. इनमें से ज्यादातर वे सीटें हैं जहां या तो RJD लड़ती रही है या लेफ्ट पार्टियां. लेकिन इन सीटों का चुनावी इतिहास कांग्रेस के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं है.यहाँ एक सवाल उठता है, कि कांग्रेस जिन सीटों पर दावा कर रही है, उनमें से कई पर लगातार हार का रिकॉर्ड रहा है. तो क्या पार्टी सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जिद में है, या उसे वाकई लगता है कि इन सीटों पर वह नया समीकरण बना सकती है?

सीमांचल पर खास नज़र

कांग्रेस का विशेष फोकस सीमांचल क्षेत्र पर है. कटिहार, किशनगंज और अररिया से उसके सांसद हैं और पप्पू यादव का अप्रत्यक्ष समर्थन भी उसे मिल रहा है. शायद यही कारण है कि कांग्रेस यहां 14 सीटों की मांग कर रही है. सीमांचल की राजनीति जातीय और धार्मिक समीकरणों से प्रभावित होती है. कांग्रेस सोच रही है कि यहाँ मुस्लिम और यादव मतदाताओं के सहारे वह अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है. मगर सवाल यह भी है कि क्या RJD इतनी आसानी से अपने गढ़ को कांग्रेस के हाथों सौंप देगी? कांग्रेस की योजना साफ है ,उसे लड़ाई RJD बनाम JDU या RJD बनाम BJP की नहीं चाहिए. वह चुनाव को सीधे तौर पर BJP बनाम कांग्रेस बनाना चाहती है. पार्टी का दावा है कि उसकी अधिकांश जीत या हार सीधे बीजेपी के खिलाफ रही है. लेकिन बिहार की सच्चाई यह भी है कि कांग्रेस ने 1985 के बाद से सत्ता का स्वाद नहीं चखा है. ऐसे में क्या सिर्फ भाजपा विरोधी छवि के बल पर कांग्रेस मतदाता को अपने पक्ष में मोड़ पाएगी?

क्या है कांग्रेस की रणनीति

पार्टी की एक और रणनीति यह है कि वह हर जिले में कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़े. यह सोच संगठनात्मक दृष्टि से सही मानी जा सकती है, क्योंकि इससे कार्यकर्ताओं को सक्रियता और ऊर्जा मिलती है. लेकिन व्यावहारिक प्रश्न यह है कि अगर हर जिले में उपस्थिति के नाम पर कांग्रेस कमजोर सीटों पर भी दांव लगाएगी, तो क्या इससे महागठबंधन की एकजुटता प्रभावित नहीं होगी? महागठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सीट बंटवारे में अच्छी और खराब सीटों का संतुलन बने. कांग्रेस इस बात पर जोर दे रही है कि RJD को सिर्फ सुरक्षित सीटें न मिलें और उसके हिस्से में कमजोर सीटें न छोड़ी जाएं. यह मांग वाजिब है, लेकिन हकीकत यह भी है कि बिहार में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा आज भी जर्जर है.

अगर कांग्रेस की रणनीति सफल हो जाती है तो कांग्रेस का यह कदम एक मायने में साहसिक है कि वह सिर्फ जितनी मिलें उतनी सीटें वाली भूमिका में नहीं रहना चाहती. लेकिन राजनीति केवल साहस से नहीं चलती, उसके लिए जमीनी पकड़, मजबूत उम्मीदवार और कार्यकर्ताओं की निष्ठा चाहिए. कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह सीटों की संख्या से ज्यादा, सीटों की गुणवत्ता पर ध्यान दे. महागठबंधन तभी सफल होगा जब सहयोगी दल आपसी अविश्वास छोड़कर साझा रणनीति अपनाएँ. वरना कांग्रेस की यह कोशिश भी उसी तरह बिखर जाएगी जैसे 2020 का चुनाव परिणाम बिखर गया था.

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