Bihar Election: सियासी दंगल में सीमांचल तय करेगा किसके हाथ आयेगी सत्ता !!

Bihar Assembly Election: बिहार की सियासी दंगल में असली उठापटक सीमांचल में होने की संभावना है. आसान भाषा में इसे समझने के लिए आप इस बात पर गौर करिए कि कैसे विधानसभा चुनाव 2025 की आहट से पहले ही सीमांचल की जमीन एक बार फिर राजनीतिक दलों के अखाड़े में तब्दील हो गई है। बिहार के इस इलाके में अपना सिक्का जमाने के लिए पहला पासा फेंका है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, जिन्होंने हाल ही में पूर्णिया से विकास की बड़ी सौगात देकर चुनावी समर का शंखनाद किया। एयरपोर्ट से लेकर हजारों करोड़ की परियोजनाओं की घोषणा का संदेश साफ है कि इस बार दिल्ली की निगाहें सिर्फ पटना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीमांचल के उस भूगोल तक गड़ी हैं, जहां की राजनीति बिहार का सत्ता संतुलन बदलने के लिए जाना जाता है.

सीमांचल का चुनावी इतिहास

सीमांचल यानी बिहार का पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जिला। कुल 24 सीटों वाला यह इलाका मुस्लिम और अति पिछड़ा बहुल है. बिहार का चुनावी इतिहास संकेत करता है कि यहां के वोटरों की झुकाव ही कई बार सरकार की डगर तय करती रही है लेकिन तीसरा मोर्चा भी यहां की राजनीति में काफी अहम है. जिसका एक प्रमाण तो ये भी है कि मुस्लिम और अति पिछड़ा बहुल वाले इस इलाके में 2020 में बीजेपी ने ओवैसी फैक्टर का अप्रत्यक्ष लाभ उठाकर आठ सीटें झटक ली थी… हालांकि अब समीकरण बदल चुके हैं। ओवैसी की पार्टी कमजोर हुई है, महागठबंधन अपनी पकड़ बचाने की जद्दोजहद में है और एनडीए अपने विकास-नैरेटिव को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ रहा है।

भले ही 2020 में बीजेपी के पाले में आठ सीटें आईं हो लेकिन बीजेपी ने सीमांचल को कभी भी अपने परंपरागत गढ़ की तरह नहीं देखा था। पिछले चुनाव के नतीजों के बाद अब पार्टी को यह विश्वास हो गया है कि यहां भी उसकी जमीन बन सकती है। पीएम मोदी का पूर्णिया दौरा और एयरपोर्ट जैसी प्रतीक्षित परियोजना की घोषणा सिर्फ विकास का एजेंडा नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश है सीमांचल अब हाशिए का इलाका नहीं, बल्कि दिल्ली की प्राथमिकता में है। वहीं, ‘घुसपैठ’ का मुद्दा अब भी पार्टी के नैरेटिव का हिस्सा है, जो सीमावर्ती जिलों में असरदार साबित हो सकता है। मतलब की पार्टी मिथिलांचल के बाद अब सीमांचल को अपना गढ़ बनाने की कोशिश कर रही है..जिसका भार सौंपा गया है किशनगंज के ही रहने वाले और वैश्य समाज से आने वाले दिलीप जायसवाल पर. दिलीप जायसवाल पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी है.

आरजेडी और कांग्रेस का समीकरण

उधर आरजेडी और कांग्रेस का समीकरण सीमांचल में हमेशा से मुस्लिम-यादव गठजोड़ पर टिका रहा है। लेकिन इस बार चुनौती बड़ी है। तभी तो चाहे राजद के बड़े नेता हो या कांग्रेस के जब बिहार भ्रमण करने निकलते हैं एक सिमांचल का एक चक्कर जरूर लगा आते हैं. इन सब के बीच जिस तरह से राहुल गांधी के वोटर अधिकार यात्रा को लोकप्रियता मिली है…उसके कुछ ही दिन के बाद प्रियंका गांधी की प्रस्तावित पूर्णिया रैली यह दर्शाता है कि कांग्रेस सीमांचल को अपनी वापसी का दरवाजा मान रही है। राज्य में पिछले 35 सालों से कांग्रेस पिछल्लगू बनी हुई है. पप्पू यादव की मौजूदगी महागठबंधन के लिए एक मजबूत स्तंभ हो सकती है। यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर उनकी पकड़ कांग्रेस को सीमांचल में नई ताकत दे सकती है। वहीं, कटिहार के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर की सक्रियता भी कांग्रेस को मुसलमानों के अलावा पिछड़ों तक पहुंचाने का जरिया है। आरजेडी ने बीमा भारती पर दांव लगाया है, जो हालिया पराजय के बावजूद क्षेत्रीय प्रभाव रखती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या महागठबंधन के भीतर तालमेल और नेतृत्व का संकट इन तमाम कोशिशों को कमजोर नहीं कर देगा?

AIMIM की पिछले चुनाव की सफलता

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने पिछले चुनाव में सीमांचल में अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी। पार्टी विधायक अख्तरुल ईमान जैसे चेहरे मुस्लिम समाज में प्रभाव रखते हैं। हालांकि, इस बार उनकी राह आसान नहीं होगी। महागठबंधन उन्हें वोटकटवा साबित करने पर तुला है और डर इस बात का भी है कि मुस्लिम मतदाता भी सामूहिक रूप से अपनी राजनीतिक ताकत एकजुट रखने के मूड में दिख सकते हैं। इसी बीच प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज उदय सिंह जैसे पुराने चेहरे के सहारे जगह बनाने की कोशिश कर रही है। उदय सिंह, जो कभी बीजेपी और कांग्रेस दोनों में रह चुके हैं, सीमांचल के सवर्ण वोटरों को साधने में सक्षम हो सकते हैं। वहीं, सरफराज आलम जैसे नेता अपने पिता तस्लीमुद्दीन की विरासत दोबारा पाने की कोशिश में हैं।

 

सीमांचल इस बार बिहार की राजनीति का निर्णायक केंद्र बनता जा रहा है। 24 सीटों का यह इलाका भले ही संख्या में कम लगे, लेकिन यहां का सामाजिक ताना-बाना और राजनीतिक संदेश पूरे राज्य में असर डालता है। बीजेपी अपने विकास और स्थानीय नेतृत्व पर दांव खेल रही है, महागठबंधन परंपरागत वोट बैंक को बचाने की कोशिश में है, जबकि नई और छोटी पार्टियां अवसर तलाश रही हैं। अंत में सवाल यह है कि क्या सीमांचल इस बार भी सत्ता के गणित को पलटेगा, या फिर 2020 की तरह अप्रत्याशित नतीजे देकर बिहार की सियासत को नई दिशा देगा?

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