बिहार विधानसभा चुनाव 2025: जब बिहार की बात हो और बिहार की राजनीति का जिक्र ना हो और चुनावी किस्से ना आए ऐसा कभी हो नहीं सकता. आज जब बिहार एक बार फिर विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा है तो पीछे चलते हैं. चुनाव के उन दिनों में जब लोकतंत्र की गाड़ी पहली बार यहां पटरी पर उतरी थी. आजादी के बाद जब यहां पहली बार चुनाव हुआ था.
बिहार में विधानसभा की चुनाव की शुरुआत 1951 से हुई इसके बाद से 2020 तक बिहार में 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. और अब बिहार में 18 वीं विधानसभा के गठन के लिए अक्टूबर नवंबर 2025 में चुनाव होंगे. हर बार की तरह आगामी चुनाव में मुख्य मुकाबला महागठबंधन और एनडीए के बीच होना तय है. अब जानना दिलचस्प होगा कि इस बार बिहार में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी.
बिहार का चुनावी इतिहास
आजादी के बाद पहली बार हुए 1951 के चुनाव में कई पार्टियों ने भाग लिया लेकिन कांग्रेस ही उसे समय सबसे बड़ी पार्टी थी कांग्रेस को 322 में से 239 सीट मिली थी. उसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव 1967 में कांग्रेस को 128 एसएसपी को 68 और जन क्रांति दल को 13 सीट मिली थी. भारतीय जनसंघ 26 सिम जीतने में कामयाब हुई थी तीनों बड़े दलों के थोड़े-थोड़े समय के लिए तीन सीएम बने.उसके बाद 1969 के चुनाव में बिहार में इंडियन नेशनल कांग्रेस 118 सीटें मिली और भारतीय जनसंघ को 34 सीटें मिली , वहां राष्ट्रपति शासन के बाद दरोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री कुछ-कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने.
अगर हम बिहार विधानसभा चुनाव 1972 की बात करें तो कांग्रेस को 167 कांग्रेस को 30 भारतीय जनसंघ को 25 और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 33 सीटें मिली थी. इस कार्यकाल में भी लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा और उसके बाद एक या दो साल के लिए केदार पांडे ,अब्दुल गफूर और जगन्नाथ मिश्रा बिहार के मुख्यमंत्री रहे.
देशभर में 1977 में इमरजेंसी के बाद संपूर्ण चुनाव में पहली बार बिहार की जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया. जनता पार्टी ने बिहार की 214 सीटों पर जीत हासिल की कांग्रेस को केवल 57 सीटें ही मिली. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 21 सीटें हासिल की. चुनाव परिणाम आने के बाद पहली बार बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनी.
बिहार विधानसभा चुनाव तो 1980 में कांग्रेस इंदिरा को बहुमत मिलने के बाद भी लगभग 4 महीने तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा उसके बाद करीब 3 साल के लिए जगन्नाथ मिश्रा और 1 साल के लिए चंद्रशेखर सिंह मुख्यमंत्री बने.
फिर 1985 में कांग्रेस को 196 सीटें मिली थी जो कि बहुमत से कहीं ज्यादा थी.
साल 1990 में चुनाव में 1988 में कई दलों के विलय से बने जनता दल ने पहली बार बिहार में चुनाव लड़ा था. उस समय 122 सीटें जीतकर जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.
फिर 1995 में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 167 सिम जीतने में सफल हुई बीजेपी 41 सीट कांग्रेस 29 सीट जीतने में कामयाब हुई.
साल 2000 में चुनाव संयुक्त बिहार का अंतिम चुनाव था चुनाव परिणाम आने के बाद 2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी थी.
साल 2005 में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव करने पड़े थे फरवरी 2005 में हुए इन चुनाव में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें से उसे 75 सीट मिली जेडीयू ने 55 सीट जीती और बीजेपी 37 सीटों के साथ विधानसभा पहुंची थी. कांग्रेस को केवल 10 सिम ही मिली थी किसी भी डाल को 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई. फिर कुछ महीनों तक राष्ट्रपति शासन के बाद 2005 में अक्टूबर नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव संपन्न हुए दोबारा हुए चुनाव में जदयू को 88 बीजेपी को 55 आरजेडी को 54 लिप्स को 10 और कांग्रेस को 9 सीटों पे ही जीत मिली थी, उसे साल नीतीश कुमार ने पहली बार बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई.
बात करें 2010 विधानसभा चुनाव की तो नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बंद करो गई थी यह चुनाव एनडीए गठबंधन से जेडीयू और बीजेपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था. इस बार भी नीतीश कुमार बिहार के सीएम बने.
साल 2015 अक्टूबर नवंबर में हुए चुनाव में सत्ताधारी जेडीयू, आरजेडी ,कांग्रेस, जनता दल ,समाजवादी पार्टी, एनसीपी और समाजवादी जनता पार्टी ने महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था. बीजेपी, लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और हिंदुस्तानी आता मोर्चा के साथ चुनावी मैदान में खड़ी उतरी थी. चुनाव परिणाम आने के बाद महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार सीएम बने साल 2017 में जदयू महागठबंधन से अलग हो गई और नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई.
बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 74 जदयू को 43 आरजेडी को 75 कांग्रेस को 19 की मल के 12 एआईएमआईएम के पांच उम्मीदवार की 2 कम दो बसपा एक हम चार लोग जनशक्ति पार्टी एक विकासशील इंसान पार्टी चार सिम जीतने में कामयाब हुई थी.
18वी विधानसभा
अब देखना यह होगा कि 2025 की चुनाव में बिहार की राजनीति में किसका पलड़ा भारी होता है. 18वी विधानसभा के गठन के लिए अक्टूबर–नवम्बर में मतदान होंगे.
बिहार के चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि यहां जनता हमेशा बदलाव के मूड में रहती है. बैलगाड़ी से ईवीएम तक का सफर सिर्फ तकनीक का नहीं बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रतीक है.