Bihar Election : शाहाबाद-मगध में रंग लाएगी पवन-कुशवाहा की जोड़ी, क्या बदलेगा बिहार का चुनावी गणित?

Shahabad Magadh politics : बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के साथ मुलाकात को बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. देखा जाए तो यह महज औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि उस ऑपरेशन शाहाबाद की अहम कड़ी है, जिसे बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में झेली करारी हार के बाद बड़े धैर्य से अंजाम तक पहुंचाया. (Bihar Election )ऐसे में बीजेपी संकेत साफ है शाहाबाद और मगध क्षेत्र के कुशवाहा और राजपूत मतदाताओं को फिर से एनडीए के पक्ष में एकजुट करना. 2020 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव ने साबित कर दिया था कि इन इलाकों में बिखरे वोटर ही एनडीए की कमजोरी की सबसे बड़ी वजह बने.

शाहाबाद किला बना अब चुनौती

बिहार का शाहाबाद क्षेत्र,जिसमें भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर जिले आते हैं एक समय एनडीए का गढ़ था. लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में यह गढ़ दरक गया. चुनावी नतीजों में भोजपुर की 7 सीटों में एनडीए केवल 2 पर सिमट गया. बक्सर और कैमूर की 8 सीटों पर एनडीए खाता तक नहीं खोल पाया. रोहतास की 7 सीटों पर भी एनडीए को हार मिली. यानी 22 सीटों में से एनडीए को केवल 2 पर जीत मिली. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी तस्वीर नहीं बदली. आरा, बक्सर, सासाराम और काराकाट चारों सीटों पर एनडीए हार गया.

लोकसभा में वोट बैंक का बिखराव

2024 के लोकसभा चुनाव में हार की सबसे बड़ी वजह रही राजपूत और कुशवाहा वोटरों का बिखराव. काराकाट में उपेंद्र कुशवाहा तीसरे नंबर पर चले गए और निर्दलीय पवन सिंह ने वोट काट दिए. आरा में केंद्रीय मंत्री आरके सिंह को CPI(ML) के प्रत्याशी सुदामा प्रसाद ने हरा दिया. बक्सर में आरजेडी के सुधाकर सिंह और सासाराम में कांग्रेस के मनोज कुमार राम ने एनडीए को मात दी. आरजेडी ने चुनाव में MYK समीकरण (मुस्लिम–यादव–कुशवाहा) पर जोर दिया और सात सीटों पर कुशवाहा प्रत्याशी उतारे. भले ही सिर्फ दो जीत पाए, लेकिन कई जगहों पर कुशवाहा वोट एनडीए से खिसकने से उसकी हार तय हो गई.

क्या है बीजेपी का ऑपरेशन शाहाबाद

हार से सबक लेकर बीजेपी ने शाहाबाद और मगध को नए सिरे से साधने की रणनीति बनाई. उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा गया. जेडीयू ने भगवान सिंह कुशवाहा को एमएलसी बनाया. प्रदेश भाजपा में शाहाबाद के 105 नेताओं को जिम्मेदारी दी गई. दलित नेता शिवेश राम को महामंत्री और बागी रहे राजेंद्र सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया. चुनाव से ठीक पहले मगध शाहाबाद की जिम्मेदारी ऋतुराज सिन्हा को दी गई. पांच दिन में उन्होंने सियासी सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए पवन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा को साथ ला दिया.

पवन–कुशवाहा की जोड़ी का होगा असर

यह गठजोड़ बीजेपी के लिए इसलिए अहम है क्योंकि 2024 में पवन सिंह की बगावत ने ही उपेंद्र कुशवाहा को हराया और आरा में भी एनडीए प्रत्याशी को नुकसान पहुंचाया. अब दोनों साथ हैं, तो बीजेपी को उम्मीद है कि राजपूत और कुशवाहा वोट बैंक फिर से एकजुट होगा और शाहाबाद-मगध में खोया हुआ आधार वापस मिलेगा. एनडीए को पुराने गढ़ को वापस जीतने के लिए सिर्फ समीकरण नहीं, जमीनी संगठन और मुद्दों पर भी मजबूती दिखानी होगी. आरजेडी-महागठबंधन अब भी जातीय गणित और स्थानीय असंतोष पर खेलेंगे. पवन सिंह की स्टार छवि और उपेंद्र कुशवाहा की जातीय पकड़ कितना असर डालेगी, यह चुनावी मैदान में ही साबित होगा.

कुल मिलाकर देखा जाए तो शाहाबाद-मगध का चुनावी रण बीजेपी के लिए सिर्फ सीटों का सवाल नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की जंग है. पवन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा का साथ आना एनडीए को मजबूती दे सकता है, पर चुनाव का नतीजा इस पर निर्भर करेगा कि क्या बीजेपी इस गठजोड़ को भरोसे में बदल पाती है या यह केवल पोस्टर की सियासत रह जाता है.

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