Bihar Politics : मिथिलांचल में एनडीए के एजेंडे पर भारी पड़ेंगे जातीय समीकरण,भाजपा के सामने गढ़ बचाने की चुनौती

Bihar Politics :  बिहार की सियासत में मिथिलांचल की राजनीति हमेशा से चुनावी परिदृश्य की धुरी रही है. इस इलाके को सत्ताधारी गठबंधन NDA का गढ़ माना जाता है. NDA में भी भाजपा यहां काफी मजबूत है. इस लेख में जानेंगे कैसे मिथिलांचल की उस सियासत की जो पटना की कुर्सी बदलने की पूरी ताकत रखती है.

मिथिलांचल इस बार भी चुनावी दंगल का अहम मैदान है. पिछले आंकड़े बताते है कि यहां की जनता को विकास की गारंटी न केवल भाती है बल्कि नतीजों में दिखता है. अब दरभंगा हवाईअड्डे को ही देख लिजिए जिसने न केवल पूरे मिथिलांचल को नई उड़ान दी है बल्कि 2020 के चुनाव में NDA के पक्ष में रहा. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले वर्ष दरभंगा एम्स का शिलान्यास भी लोगों के नजर में है.भले ही एम्स का लाभ अभी आमजन तक नहीं पहुंचा है, लेकिन लोग उस वादे को भूले नहीं हैं. इसके अलावा तारामंडल, आइटी पार्क, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, डीएमसीएच में 1700 बेड की नई सुविधा, आमस-दरभंगा एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजनाएं विकास की कहानी सुना रही हैं. मखाना बोर्ड की स्थापना ने किसानों में उम्मीदें जगाई हैं. इन सबके बूते एनडीए अपने गढ़ को और मजबूत मान रहा है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और खुद प्रधानमंत्री का दौरा ने इसे और धार दी है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा जैसे स्थानीय नेताओं के दौरों से भी कार्यकर्ताओं में उत्साह है.

महागठबंधन भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में है. राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा और प्रियंका गांधी की दरभंगा-मधुबनी रैली ने विपक्ष की सक्रियता बढ़ा दी है. तेजस्वी यादव, वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी और माले के दीपंकर भट्टाचार्य लगातार प्रचार में जुटे हैं. हालांकि दरभंगा में एक मंच से प्रधानमंत्री की मां के खिलाफ अपशब्द बोले जाने से महागठबंधन को नुकसान की आशंका है. यह मामला चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है. दरभंगा वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी का गृह जिला है. उनके लिए यह चुनाव न केवल राजनीतिक अस्तित्व बल्कि साख की भी लड़ाई है. 2020 में उन्होंने एनडीए के साथ रहते हुए दरभंगा की दो सीटें जीती थीं, लेकिन बाद में दोनों विधायक भाजपा में चले गए. इस बार उन्हें न केवल अपने पुराने गढ़ को वापस पाना है, बल्कि जन सुराज के प्रशांत किशोर की बढ़ती सक्रियता से भी जूझना है. प्रशांत किशोर के लगातार दौरों और सभाओं ने चुनावी माहौल में नया रंग भर दिया है.

इन सबके अलावा चुनावी माहौल में टिकट की जंग ने सभी दलों को बेचैन कर दिया है. इंटरनेट और मीडिया में स्थानिय नेता अपनी दावेदारी को मजबूत दिखाने की होड़ में लगे हैं. एक तरफ जहां मधुबनी की 10 सीटों पर इस बार कांग्रेस भी अधिक हिस्सेदारी चाह रही है तो राजद अपनी स्थिति और मजबूत करनी चाह रही है. 2020 में कांग्रेस अपनी दोनों सीटें (फुलपरास व बेनीपट्टी) हार चुकी थी, लेकिन अब वह इनके अलावा हरलाखी भी मांग रही है. झंझारपुर सीट को लेकर भी एनडीए में भी खींचतान है लेकिन जदयू के एक खेमा इसे अपने लिए चाहता है. तो भाजपा अपने गढ़ में अपनी मजबूती को कमजोर नहीं करना चाहती

कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार की राजनीति में मिथिलांचल किस ओर झुकता है यह बड़ा सवाल होगा. यह चुनावी नतीजा पूरे बिहार की राजनीति का भविष्य तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है.

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