औरंगाबाद में कांग्रेस भाजपा की पारंपरिक ताकतों को तोड़ने की कोशिश में जुटे नए दावेदार

Aurangabad Vidhansabha seat: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारी के बीच औरंगाबाद विधानसभा सीट एक बार फिर चर्चा में है. यह सीट न केवल अपनी समृद्धि ऐतिहासिक विरासत के लिए जानी जाती है, बल्कि इसकी जटिल चुनावी राजनीति भी इसे खास बनाती है. राजपूत बाहुल्य क्षेत्र में इस बार चुनावी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं. दक्षिण बिहार में स्थित औरंगाबाद प्राचीन मगध साम्राज्य का हिस्सा हुआ करती थी. शेरशाह सूरी के काल में यह रोहतास सरकार का महत्वपूर्ण भाग थी शहर का नाम मुगल शासक औरंगजेब से जोड़ा जाता है. हालांकि कुछ इतिहासकार इसे गोहद या गोहदपुर जैसे पुराने नाम से भी जानते हैं.

1991 में अपनी स्थापना के बाद से औरंगाबाद विधानसभा सीट की राजनीति में एक खास पैटर्न दिखाई देता है. इस सीट पर राजपूत समुदाय का लंबे समय तक दबदबा बना रहा है. राजपूत मतदाता जो कुल मतदाताओं का 22% से अधिक है.

पारंपरिक रूप से राजपूत उम्मीदवारों को समर्थन करते आ रहे हैं. चाहे वह किसी भी पार्टी से क्यों ना हो शुरुआती दशकों में कांग्रेस का दबदबा रहा जिसे कुल आठ बार जीत दर्ज की, भाजपा ने चार बार जीत हासिल कर अपनी मजबूती उपस्थित दर्ज कराई, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी स्वतंत्रत पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी कभी-कभार सफलता पाई.

एक महत्वपूर्ण मोड़ 2000 में आया जब राजद की जीत ने राजपूत वर्चस्व को चुनौती दी यह पहली बार था. जब किसी गैर राजपूत उम्मीदवार नहीं यह जीत दर्ज की थी यह घटना औरंगाबाद की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव का संकेत थी.

पिछले दो विधानसभा चुनाव से यहां इंडियन नेशनल कांग्रेस का दबदबा कायम है 2015 में आनंद शंकर सिंह ने बीजेपी के रामाधार सिंह को 18398 वोटो से हराया था उसे साल के नतीजे पर गठबंधन समीकरण का बड़ा असर हुआ था.

वही 2020 में आनंद शंकर सिंह ने दोबारा सीट जीती थी और बीजेपी के रामाधार सिंह को 2243 वोटो से हराया था औरवह मुकाबला 2020 में भी औरंगाबाद जिले की सीटों पर महागठबंधन बनाम एनडीए का रंग दिखा था गठबंधन रूपरेखा और स्थानीय त्रिकोणी मुकाबला ने परिणामों को प्रभावित किया था.

पिछले कुछ दशकों में औरंगाबाद नक्सली गतिविधियों के कारण अशांत रहा है. रंगदारी और हिंसा के क्षेत्र के विकास को प्रभावित किया. हालांकि, 2024 के साउथ एशियन टेररिस्ट पोर्टल(SATP) के आंकड़ों के अनुसार औरंगाबाद गया और लखीसराय उन तीन जिलों में शामिल है जहां माओवादी गतिविधियों की मामूली प्रभाव रह गए हैं. बीते 5 वर्षों में बिहार में माओवादी वाली घटनाओं में 72% की गिरावट आई है. राज्य सरकार ने 2025 के अंत तक इस उग्रवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा है.

2025 में चुनाव का समीकरण कैसा होगा वह तो नतीजा बताएंगे लेकिन औरंगाबाद सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होगा. जहां मौजूदा विधायक आनंद शंकर सिंह की स्थिति मजबूत है. लेकिन, उनके लिए चुनौती भी उतनी ही ज्यादा है. और भाजपा 2020 की हार का बदला लेने के लिए कमर कस चुकी है. जहां नए खिलाड़ी मैदान पर उतरे जैसे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की नई पार्टी पहली बार मैदान में है जो पारंपरिक राजनीति को चुनौती देने को तैयार है वहीं आरजेडी से निष्कासन के बाद स्वतंत्र रूप से नए मंच से चुनाव लड़ने की तैयारी में है तेज प्रताप यादव भी.

औरंगाबाद विधानसभा सीट  पर सभी पार्टियों की रणनीति शायद अलग-अलग हो सकती है, पर विकास के मुद्दे और लोगों के लिए काम सबके एक बराबर ही होने चाहिए. जहां भाजपा विकास के मुद्दे और सरकार की योजनाओं को हथियार बना रही है, वहीं महागठबंधन अपनी  2024 की जीत का लाभ उठाना चाह रही है. तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचारी विरोधी एजेंडा के साथ प्रशांत किशोर भी उतर आए हैं, तो कहीं इसी में यादव वोट बैंक में तेज प्रताप यादव सेंड लगा दे जो शायद राजद के लिए चुनौती भी बन सकती है.

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