15 में से 10 बार कैसे जीता एक ही परिवार? जाने गोबिंदपुर की दिलचस्प राजनीतिक कहानी…

Gobindpur vidhanshabha seat: नवादा बिहार के 38 जिलों में से एक है. यह जिला 2 अनुमंडल और 14 प्रखंडों में विभाजित है. जिले में कुल पांच विधानसभा सीट हैं– रजौली, हिसुआ, नवादा, गोबिंदपुर और वर्षालीगंज. गोबिंदपुर की स्थापना 1967 में हुई थी, और तब से यह बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से एक महत्वपूर्ण सीट बन गई है.

बिहार की राजनीतिक में कुछ विधानसभा सीट ऐसी है, जहां एक ही परिवार का दशकों तक वर्चस्व रहा है. गोबिंदपुर विधानसभा सीट भी उन्हीं में से एक है. जहां की राजनीतिक कहानी बेहद रोचक और नाटिकीय हैं. यह सीट नवादा जिले में स्थित और नवादा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आती है. सबसे रोचक बात ये है कि 2005 के चुनाव में यह दिग्गज विधायक गायत्री देवी अपने ही बेटे कौशल यादव से हार गई थी.

गोबिंदपुर की राजनीति पर कौशल यादव और गायत्री देवी के परिवार का लंबे समय तक दबदबा बना रहा. इस परिवार की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1969 में युगल किशोर सिंह यादव से हुई थी. जिन्होंने लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर यहां से पहली बार जीत हासिल की थी. गायत्री देवी इस परिवार की प्रमुख राजनीतिक चेहरा बनी, जो पांच बार इस सीट से विधायक बनी और लगभग 22 साल तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती आ रही थी.

गोबिंदपुर की राजनीति में 2005 का साल सबसे नाटकीय था, फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद की गायत्री देवी को अपने ही बेटे कौशल यादव ने चुनाव में हरा दिया. निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाले कौशल यादव ने शानदार जीत दर्ज अपने नाम की. यह बिहार की राजनीति का एक नया उदाहरण था जहां बेटे ने अपनी ही मन को चुनावी मैदान में हराया.

अक्टूबर 2005 में जब दोबारा चुनाव हुए तो विधानसभा में कौशल यादव ने फिर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, और 15,276 मतों के अंतर से राजद के संजय कुमार प्रभात को हराकर जीत हासिल की.

पिछले दो चुनाव की बात करें तो 20 साल बाद कांग्रेस की 2015 में वापसी हुई,और एक बड़ा बदलाव देखने को मिला. इस बार तत्कालीन विधायक कौशल यादव की पत्नी पूर्णिमा यादव ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, और महागठबंधन की लहर में पूर्णिमा यादव ने भारतीय जनता पार्टी की फुला देवी को 4,399 वोटो के अंतर से हराया. वही 2020 के विधानसभा चुनाव में गोबिंदपुर की राजनीति में एक बार फिर उलट फेर हुआ इस बार पूर्णिमा यादव ने जदयू की टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन वह हार गई और राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता मोहम्मद कामरान ने 33,074 वोटो के काफी बड़े अंतर से शानदार जीत हासिल की.

गोबिंदपुर विधानसभा सीट की राजनीतिक यात्रा बिहार की बदलती राजनीति का प्रतीक है 15 चुनाव में से 10 बार एक ही परिवार की जीत इस क्षेत्र में उनके मजबूत जन आधार को दर्शाती है वहीं 2020 की हर यह भी बताती है कि अब मतदाता केवल परिवार या जाति के आधार पर वोट नहीं देते बल्कि प्रदर्शन और विकास को महत्व देते हैं.

2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए गोबिंदपुर सीट फिर से चर्चा में बनी हुई है. क्या मौजूदा विधायक मोहम्मद कामरान अपनी सीट बचा पाएंगे, या यादव परिवार फिर से राजनीतिक वापसी करेगा. देखना दिलचस्प होगा कि वर्तमान में सभी प्रमुख दल सीट को जीतने के लिए अपनी रणनीति बना रहे हैं, पर लोकतंत्र में कोई भी किसी के नाम पर आरक्षित नहीं है. अब फैसला जनता के हाथ में है और जनता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है.

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