Bihar politics : भाजपा को अपने गढ़ में जन सुराज की चुनौती, दरभंगा में किला बचा पाएंगे संजय सरावगी !

Bihar chunav : मिथिलांचल की राजनीति का केंद्र माने जाने वाला दरभंगा विधानसभा क्षेत्र लंबे समय तक सियासी उतार-चढ़ाव का गवाह रहा है. विशेषकर वर्ष 2000 तक यहां हर चुनाव में परिदृश्य बदलता रहा. मगर इसके बाद से इस सीट पर भगवा झंडा लगातार लहराता रहा है. पिछले दो दशकों से भाजपा नेता और वर्तमान भूमि सुधार एवं राजस्व मंत्री संजय सरावगी यहां से लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं. हालांकि जमीनी प्रतिक्रिया देखें तो इस बार उनकी राह आसान नहीं रहने वाली. संजय सरावगी इस सीट से सबसे अधिक पांच बार चुनाव जीतने वाले विधायक हैं. उनके खिलाफ मुख्य विपक्षी दल राजद ने हर बार नए चेहरे उतारे, लेकिन जीत की राह नहीं खोल पाई. 2015 का चुनाव ही एकमात्र ऐसा मौका रहा, जब राजद के उम्मीदवार ओमप्रकाश खेड़िया ने उन्हें कड़ी चुनौती दी थी. लेकिन उस समय राजद के साथ जदयू भी गठबंधन में था.

अब 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इस बार न केवल महागठबंधन के राजद और कांग्रेस बल्कि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी भाजपा के इस गढ़ को भेदने के लिए मैदान में डटी है. खबर है कि जनसुराज भाजपा के इस किला को भेदने के साम-दाम दंड-भेद हर तरीके से तैयारी में जुटी है और बड़े चेहरे को प्रत्याशी बनाने जा रही है. यह चुनाव इसलिए भी दिलचस्प होगा क्योंकि पिछले दो दशकों से जिस सीट पर भाजपा की पकड़ मजबूत रही है, उस पर विपक्ष ने अभूतपूर्व तैयारी की है. दरभंगा में विपक्षी दल महागठबंधन (राजद और कांग्रेस) इस बार पहले से ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहा है. हाल ही में राहुल गांधी ने भी यहां आकर एनडीए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था. उधर, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी इस सीट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. प्रशांत किशोर की पदयात्रा और संवाद कार्यक्रमों ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में हलचल पैदा की है.

दरभंगा विधानसभा सीट की राजनीतिक यात्रा भी कम रोचक नहीं रही है. यह सीट 1951 में दरभंगा सेंट्रल के नाम से अस्तित्व में आई थी और 1967 के बाद इसका नाम दरभंगा हो गया. स्थानीय लोग इसे अब दरभंगा शहरी विधानसभा के नाम से पुकारते हैं. अब तक इस सीट पर कुल 17 चुनाव हुए हैं. इनमें 8 बार भाजपा और उसके पूर्ववर्ती संगठन जनसंघ, 6 बार कांग्रेस,एक बार सीपीआई, एक बार जनता दल और एक बार राजद ने जीत दर्ज की है.1952 से 1969 तक कांग्रेस के शेख सईदुल हक और रामेश्वर प्रसाद सिन्हा का यहां दबदबा रहा. 1969 में मारवाड़ी समाज के लोकप्रिय सीपीआई नेता रामाबल्लभ जालान ने जनसंघ के प्रत्याशी सुरेंद्र झा सुमन को हराया. 1972 में पहली बार जनसंघ ने इस सीट पर जीत हासिल की. कांग्रेस के लिए यह सीट आखिरी बार 1985 में चमकी, जब अशफाक अंसारी ने जीत दर्ज की. इसके बाद कांग्रेस की वापसी यहां नहीं हो पाई. 2005 से अब तक लगातार संजय सरावगी भाजपा के लिए यहां से जीतते आ रहे हैं.

दरभंगा की पहचान महज राजनीतिक नहीं है. यह शहर दरभंगा राज परिवार के योगदान के लिए जाना जाता है, जिसने शिक्षा, संस्कृति और उद्योग के विकास में अहम भूमिका निभाई. दरभंगा ध्रुपद संगीत का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां दो विश्वविद्यालय और श्यामा मंदिर जैसे आस्था के केंद्र हैं. हाल के वर्षों में दरभंगा एयरपोर्ट शुरू होने से यहां की हवाई संपर्कता बढ़ी है, जिससे व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिला है. विकास के नए आयामों के बावजूद शहर के सामने कई स्थायी समस्याएं अब भी मौजूद हैं, जो हर चुनाव में मतदाताओं के मूड को प्रभावित करती हैं.

दरभंगा शहर की सबसे पुरानी और गंभीर समस्या जलजमाव की है. बारिश के दिनों में शहर के कई मोहल्ले जलमग्न हो जाते हैं. हाल के वर्षों में स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम के तहत नालों का निर्माण जरूर हुआ है, लेकिन इसकी गुणवत्ता और कार्यशैली को लेकर जनता में असंतोष बना हुआ है. इसके अलावा पेयजल संकट हर साल विकराल होता जा रहा है. शहर के कुछ हिस्सों में पानी की कमी और पेयजल की गुणवत्ता को लेकर नाराजगी बढ़ी है. सड़कें भी शहर के विकास का अहम मुद्दा रही हैं. नव निर्माण कार्य की वजह से कई सड़कें जर्जर हो गई हैं, जिससे यातायात प्रभावित हो रहा है. रेलवे फाटकों पर अब तक आरओबी (रेलवे ओवरब्रिज) का निर्माण नहीं हो पाया है, जिससे जाम की समस्या बनी रहती है. ये सभी समस्याएं स्थानीय चुनावी विमर्श का केंद्र बनती रही हैं.

दरभंगा शहर चूंकि शहरी क्षेत्र को कवर करता है, इसलिए यहां नागरिक सुविधाएं, शहरी विकास, ट्रैफिक प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं, बाढ़ और जल निकासी की समस्या मुख्य चुनावी मुद्दे बनते हैं. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को लेकर भी लोगों की बड़ी उम्मीदें हैं, लेकिन कार्यों की धीमी रफ्तार और अधूरी योजनाएं सवालों के घेरे में हैं. शहर में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है. दरभंगा की जनता विकास के कामों को देख रही है, लेकिन स्थानीय समस्याओं को लेकर असंतोष भी है. लोग कहते हैं कि संजय सरावगी ने सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान दिया, परंतु जलजमाव, ट्रैफिक और पेयजल संकट अब भी जस के तस हैं. महागठबंधन और जन सुराज इस असंतोष को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा विकास की उपलब्धियों को गिना कर अपनी बढ़त बनाए रखने की कोशिश में है. ऐसे में दरभंगा विधानसभा सीट पर मुकाबला इस बार भी रोचक और कड़ा होने के आसार हैं.

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