Bihar election 2025: दरभंगा लोकसभा के अंतर्गत जो 10 विधानसभा सीट आते हैं उसमें एक अहम सीट है दरभंगा ग्रामीण, बिहार विधानसभा का यह सीट काफी मायने में अहम है. राजनीतिक मायने से देखें तो यह सीट भले ही पटना और दिल्ली की सियासी हलचलों से दूर दिखती हो, लेकिन राज्य की राजनीति में इसका महत्व कम नहीं है. दरभंगा के दूसरे सीट जहां भाजपा और उसके सहयोगी अपना दबदबा रखते है…दरभंगा ग्रामीण का यह सीट लंबे समय से आरजेडी का किला माना जाता है. 2000 से लगातार यह सीट आरजेडी के पास रही है. शुरुआत में जब यह क्षेत्र मनीगाछी विधानसभा का हिस्सा था तब से लेकर 2010 में परिसीमन के बाद जब इसे दरभंगा ग्रामीण नाम दिया गया.
बिहार में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के बीच यह सीट एक बार फिर सुर्खियों में है. जो दरभंगा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और इसमें संपूर्ण मनीगाछी प्रखंड और दरभंगा सदर ब्लॉक के 17 ग्राम पंचायत शामिल हैं. यह सीट सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे की वजह से काफी चर्चा में रहती है. लेकिन जमीन पर लोगों से बातचीत में यह पता चलता है कि सड़क, पानी और भ्रष्टाचार जैसे अहम स्थानीय मुद्दों को जनता तरजीह देती है लेकिन नतीजों में कोई खास या बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलता. खैर ये सब ऐसे मुद्दे हैं, जिनके बारे में हर चुनाव में बातें होती हैं, लेकिन नतीजे अब तक नाकाफी रहे हैं.दरभंगा शहर से जुड़ाव के बावजूद बाहरी पंचायतों में बुनियादी ढांचे की कमी, खासकर मनीगाछी ब्लॉक में अब भी सड़क, सिंचाई और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली साफ नजर आती है. नतीजन इन हालातों ने मौसमी पलायन को यहां की स्थायी सामाजिक प्रवृत्ति बना दिया है.
दरभंगा ग्रामीण का यह सीट 2000 से लगातार आरजेडी के पास रही है.और मौजूदा विधायक ललित कुमार यादव 2010 से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं और इस बार भी आरजेडी की पहली पसंद माने जा रहे हैं. हालांकि, राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि वे इस बार अपने बेटे को मैदान में उतार सकते हैं. लेकिन आरजेडी के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस बार लोजपा (रामविलास) और एनडीए की एकजुटता से आ रही है. 2020 के चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार रहे फराज फातमी के आरजेडी में लौट आने से एनडीए की रणनीति पर असर पड़ा है. लेकिन जेडीयू भी हार मानने के मूड में नहीं है. चर्चा है कि जेडीयू राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की पत्नी को प्रत्याशी बना सकती है, जबकि जिला महासचिव चंदन जायसवाल भी दावेदारी पेश कर रहे हैं. एलजेपी(आर) से प्रदीप ठाकुर पहले से ही तैयारी में जुटे हैं. इन सबके साथ इस बार यहां से जनसुराज भी प्रयास कर रहा और जनसुराज के प्रयास को जनता द्वारा सराहा भी जा रहा. खबर है कि जनसुराज इस बार इस सीट से किसी मुस्लिम प्रत्याशी को अपना उम्मीदवार बना सकती है. हालांकि किसके नाम पर अंतिम मुहर लगेगी इसको लेकर कुछ भी नहीं कहा जाता है. क्योंकि सीट भले एक हो लेकिन दावेदार कई हैं.
दरभंगा ग्रामीण सीट की राजनीति जातीय समीकरणों से गहराई से प्रभावित है. यहां मुस्लिम, यादव और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं तो कोइरी, रविदास और पासवान वोटर भी अहम है. आंकड़े बताते है कि ललित यादव ने अब तक यादव-मुस्लिम और दलित वोटरों की गोलबंदी से लगातार जीत दर्ज की है. लेकिन एनडीए के साथ लोजपा की मौजूदगी इस बार समीकरण को बिगाड़ सकती है. संजय झा जैसे सवर्ण चेहरे की संभावित उम्मीदवारी भी आरजेडी के लिए चुनौती पेश कर सकती है तो जन सुराज का होना भी इस समीकरण को प्रभावित कर सकता है. कुल मिलाकर देखें तो दरभंगा ग्रामीण का चुनाव इस बार विकास के वादों और जातीय राजनीति के बीच फंसा दिख रहा है. आरजेडी के लिए सीट बचाना आसान नहीं होगा. ललित यादव का करिश्मा अब भी असरदार है, लेकिन मतदाता अब सिर्फ चेहरे से संतुष्ट नहीं हैं. वे बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं. यदि एनडीए स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा और जनसुराज इस वोट में सेंध मारने में कामयाब हो जाती है तो मुकाबला त्रिकोणीय और बेहद कड़ा हो सकता है.