जहां हर चुनाव में बदलते हैं राजनीतिक समीकरण, इस बार किसका होगा पलड़ा वजीरगंज विधानसभा सीट पर भारी? 

Wazirganj vidhansabha seat: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारी के बीच गया जिले की वजीरगंज विधानसभा सीट एक बार फिर सुर्खियों में है. यह सीट अपने अनोखे राजनीतिक चरित्र के लिए जानी जाती है. जहां हर चुनाव में नए समीकरण बनते हैं, 2010 में बीजेपी की जीत 2015 में कांग्रेस का उलट फेर और फिर 2020 में बीजेपी की शानदार वापसी. यह सीट किसी एक दल की बापोती नहीं रह रही है.

वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र गया शहर से लगभग 20 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित हैं. यह गया और नवादा जिला की सीमा पर बसा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र है. गया जिले की कुल 10 विधानसभा सीटों में से यह एक सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. कृषि प्रधान इस क्षेत्र में किसानों की समस्याएं सिंचाई बिजली सड़क और रोजगार प्रमुख मुद्दे हैं.

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के बीरेंद्र सिंह ने कांग्रेस के शशि शेखर सिंह को करारी विकास दीदी 22430 वोटो के अंतर से जीत हासिल की थी. बीरेंद्र सिंह ने लगभग 22 हजार वोटो के बड़े अंतर से जीत हासिल की, जो कि उनकी मजबूत पकड़ को दर्शाता है, और यह जीत एनडीए के लिए राहत भरी थी, क्योंकि 2015 में उनके हाथ से निकल गई थी. वही 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव महागठबंधन की जीत के लिए याद किया जाता है. वजीरगंज में भी महागठबंधन की लहर देखने को मिली थी. कांग्रेस के अवधेश कुमार सिंह ने मौजूदा विधायक बीरेंद्र सिंह को हराकर बड़ा उलट फेर किया था. यह जीत कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई थी. अवधेश कुमार सिंह ने जमीनी स्तर पर मजबूत अभियान चलाकर यादव मुस्लिम समीकरण को साधा और बीजेपी की सत्ता को चुनौती दी थी.

वजीरगंज की राजनीति को समझने के लिए यहां के सामाजिक समीकरण को समझना काफी जरूरी है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यहां चार प्रमुख सामाजिक समूह चुनावी नतीजे तय करते हैं. जैसे यादव समुदाय परंपरागत रूप से राजद और महागठबंधन के समर्थक माने जाते हैं, और 2015 की जीत में उनकी अहम भूमिका रही है. बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक राजपूत समुदाय है, 2010 और 2020 की जीत में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है. वही धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पक्षधर मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के लिए निर्णायक वोट साबित हो सकते हैं. वही मांझी समुदाय को स्विंग वोटर माना जाता है. जो पार्टी इन्हें साध लेती हैं, उसकी जीत की संभावना बढ़ जाती है. इन सभी समुदाय का संतुलन बनाना हर दल के लिए चुनौती है. 2020 में बीजेपी ने राजपूत वोटो के साथ मांझी समुदाय का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में किया था, जबकि 2015 में महागठबंधन ने यादव मुस्लिम एकता के साथ अन्य वर्गों को जोड़कर जीत हासिल की थी.

बिहार में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को होने हैं. जबकि मतगणना 14 नवंबर को होगी. वही महागठबंधन के लिए वजीरगंज जितना प्रतिष्ठा का सवाल है. 2015 की जीत की याद ताजा करते हुए वह इस बार भी सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश जरूर करेंगे. तीन चुनाव में तीन अलग-अलग नतीजे इस सीट की अनिश्चित स्वभाव को दर्शाते हैं. 2025 का चुनाव भी उतना ही रोमांचक होने का वादा करता है. एक बात तय हैं, वजीरगंज के मतदाता हर बार स्वतंत्र रूप से सोचते हैं, और अपना फैसला करते हैं. 14 नवंबर को जब मतगणना होगी तब पता चलेगा कि इस बार जनता ने किस पर भरोसा जताया है.

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