Bihar assembly election 2025: बिहार के मिथिलांचल का राजनगर विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक दृष्टि से जितना पुराना और संघर्षपूर्ण है, यह उतना ही विकास में पिछड़ा हुआ भी है. मधुबनी जिले के इस सीमावर्ती इलाके का इतिहास केवल चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं, बल्कि राज्य की उस विफल नीति का प्रतिबिंब है जिसने वर्षों से यहां की जनता को बाढ़, गरीबी और पलायन के चक्रव्यूह में जकड़ रखा है.
कमला नदी यहां की जीवन रेखा भी है और अभिशाप भी. हर साल आने वाली बाढ़ किसानों की मेहनत को बहा ले जाती है, खेत उजड़ जाते हैं और हजारों परिवार विस्थापित होते हैं. तटबंधों की जर्जर स्थिति प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है. सड़कें टूटी हुई हैं, सिंचाई व्यवस्था बदहाल है, कई गांवों में आज भी बिजली और पेयजल की आपूर्ति नियमित नहीं है. स्कूल-कॉलेजों की हालत जर्जर है और स्वास्थ्य सेवाएं तो नाम मात्र की हैं. हैरान करने वाली बात है कि सीमा सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से इतने अहम क्षेत्र के लिए राज्य और केंद्र सरकारों ने अब तक कोई विशेष योजना नहीं बनाई? और अगर बनी भी है तो सिर्फ कागजों तक सीमित है.
परिसीमन के बाद से राजनगर अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट है. यहां पासवान, रविदास, भूमिहार, कुर्मी और कोइरी जातियों के साथ-साथ मुस्लिम और यादव मतदाता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यही कारण है कि हर दल की रणनीति जातीय संतुलन साधने पर केंद्रित रहती है. लेकिन जातीय समीकरण के फेर में इस क्षेत्र के वास्तविक मुद्दे जैसे सड़क, शिक्षा, सिंचाई, स्वास्थ्य, और रोजगार हाशिए पर हैं.
राजनगर विधानसभा सीट का गठन पहली बार 1967 में हुआ था, लेकिन यह क्षेत्र 1977 से लेकर 2008 तक अस्तित्व से गायब रहा. 2008 के परिसीमन के बाद इसे फिर से राजनगर के नाम से पहचान मिली. अब देखें तो नाम बदले, सीमाएं बदलीं मगर समस्याएं वहीं की वहीं रहीं. अब तक यहां सात चुनाव हो चुके हैं. इनमें तीन बार कांग्रेस, दो बार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और दो बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जीत दर्ज की. यह रिकॉर्ड बताता है कि जनता ने हर बार उम्मीद बदली, लेकिन उनके जीवन और क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं आया. पिछले दस वर्षों से भाजपा के रामप्रीत पासवान इस सीट के विधायक हैं. उन्होंने 2015 और 2020 में लगातार जीत हासिल की, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इलाके के कई गांवों में आज भी लोग अपने विधायक को पहचानते तक नहीं. यह तथ्य अपने आप में स्थानीय राजनीति की सबसे बड़ी विफलता को उजागर करता है. हालांकि रिपोर्ट की मानें तो इस बार फिर से रामप्रीत पासवान पर भाजपा दावं लगाने जा रही है.
2025 के चुनावी समीकरण में राजनगर एक बार फिर सुर्खियों में है. भाजपा और राजद के पारंपरिक मुकाबले के बीच अब प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी मैदान में उतर चुकी है. पार्टी ने यहां से डॉ. प्रो. सुरेंद्र दास को उम्मीदवार घोषित किया है. जनसुराज का दावा है कि वह जाति के बजाय विकास को मुद्दा बनाएगी. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जनसुराज की एंट्री पारंपरिक समीकरणों को तोड़ पाएगी या फिर यह भी अन्य दलों की तरह चुनावी वादों तक ही सीमित रह जाएगी.