मधुबनी की सियासत में इस बार बदलेगा समीकरण ,  एनडीए, महागठबंधन और जनसुराज के बीच त्रिकोणीय मुकाबले

Bihar assembly election 2025: मधुबनी को मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है ,मधुबनी पेंटिंग जैसी विश्वविख्यात कला की भूमि, जो यहां की ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का अहम स्रोत है. तो इसके साथ साथ कई और भी अहम और महत्वपूर्ण पहलू है जो मधुबनी की सियासत को साधने की ताकत रखते हैं जैसे सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि कला और संस्कृति के इस गढ़ में विकास की तस्वीर उतनी उजली नहीं. बाढ़, पलायन, बेरोजगारी और जलजमाव यहां के स्थानीय मुद्दे बने हुए हैं. कोसी और कमला बलान की बाढ़ हर साल तबाही लाती है, जबकि शिक्षा और रोजगार के लिए युवाओं को आज भी बाहर जाना पड़ता है.

सियासत के मायने से देंखे तो मधुबनी सीट की राजनीतिक बिसात हमेशा से रोचक रही है. आखिरी बार 2010 में कमल यहां खिला था, जब बीजेपी के रामदेव महतो ने जीत दर्ज की थी. उसके बाद 2015 और 2020 में राजद के समीर महासेठ ने लगातार जीत हासिल की. 2020 में यह सीट एनडीए के सहयोगी वीआईपी के हिस्से में आई थी, लेकिन वीआईपी उम्मीदवार सुमन महासेठ को राजद प्रत्याशी ने पराजित कर दिया था.

वहीं जातीय समीकरण की बात करें तो यादव, ब्राह्मण, कायस्थ, अनुसूचित जाति और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. शहरी और ग्रामीण आबादी का अनुपात लगभग समान है, लेकिन मतदान में ग्रामीण इलाकों की भागीदारी हमेशा अधिक रहती है.  एनडीए गठबंधन ने इस सीट को राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के खाते में दिया है, और पार्टी ने माधव आनंद को अपना उम्मीदवार बनाया है. वहीं, महागठबंधन की ओर से राजद के मौजूदा विधायक समीर कुमार महासेठ के मैदान में उतरने की पूरी संभावना है, हालांकि उनके नाम की आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है.

जनसुराज से मुस्लिम प्रत्याशी की चर्चा सियासी गलियारों में जोरों पर है और अगर ऐसा होता है, तो महागठबंधन को इसका नुकसान झेलना पड़ सकता है. भले ही सीट रालोसपा के हिस्से में आई हो, लेकिन असली मेहनत बीजेपी को करनी होगी. माधव आनंद की जीत का रास्ता तभी आसान होगा जब भाजपा कार्यकर्ता एकजुट होकर मैदान में उतरे. टिकट बंटवारे से नाराज़ कुछ स्थानीय भाजपा नेता अगर निर्दलीय रूप में मैदान में उतरते हैं, तो एनडीए के लिए यह स्थिति मुश्किलें बढ़ा सकती है.

इस बार चुनावी जंग त्रिकोणीय होने की संभावना है  एनडीए, महागठबंधन और प्रशांत किशोर की जनसुराज के बीच. सवाल यह है कि क्या माधव आनंद मिथिला की इस ऐतिहासिक सीट पर एनडीए का खोया जनाधार वापस ला पाएंगे, या फिर समीर महासेठ की पकड़ एक बार फिर भारी पड़ेगी? और वो जीत का हैट्रिक लगा पाएंगे. मधुबनी की जनता ने कई बार सत्ता बदलते देखी है, लेकिन समस्याएं जस की तस हैं. अब देखना यह है कि 2025 में मधुबनी विकास की दिशा में कदम बढ़ाती है या एक बार फिर जातीय और राजनीतिक समीकरणों में उलझ जाती है.

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