बागी नेता और जातीय समीकरण बदल सकते हैं लौकहा का समीकरण, किसे मिलेगी जीत और किसके हिस्से आएगी हार 

Bihar assembly elections 2025: भारत और नेपाल की सीमा से सटा बिहार का लौकहा विधानसभा क्षेत्र भले ही भौगोलिक रूप से सीमांत इलाका हो, लेकिन राजनीति के लिहाज से यह हमेशा से केंद्रीय चर्चा में रहा है। मधुबनी जिले के उत्तरी हिस्से में बसा लौकहा न सिर्फ मिथिला की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है, बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी एक स्विंग सीट है, जहाँ किसी एक दल का स्थायी दबदबा कभी नहीं बन पाया।

1952 से अब तक 17 बार हुए चुनावों में लौकहा ने बार-बार यह साबित किया है. कभी कांग्रेस का गढ़ रहा यह इलाका बाद में जनता दल और राजद की ओर झुका, जबकि जदयू ने 2000 से 2015 तक तीन बार लगातार जीत हासिल कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की। लेकिन 2020 में यह किला ढह गया और राजद के भारत भूषण मंडल ने जदयू के लक्ष्मेश्वर राय को हराकर सीट छीन ली। हालांकि लक्ष्मेश्वर राय अब पाला बदल चुके है इस कारण से भी लौकहा एक बार फिर सियासी प्रयोगशाला बन गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नजर इस सीट पर विशेष रूप से है। जदयू लीक से हटकर उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर काम कर रही है ताकि यादव और तेली समुदाय के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके। तेली जाति के मतों का झुकाव पिछले दो चुनावों में निर्णायक साबित हुआ था, और इस बार यह समुदाय अपनी सामूहिक राजनीतिक ताकत दिखाने के मूड में है।2025 के चुनावी समर में मुकाबला त्रिकोणीय है. NDA और महागठबंधन की सीधी लड़ाई में जनसुराज भी मैदान में है. चुनावी मैदान में जनसुराज से रेणु देवी और एनडीए के उम्मीदवार के रूप में पूर्व विधायक सतीश कुमार शाह दावेदार है, वहीं महागठबंधन से अभी तक साफ नहीं हो सका है.

लौकहा का सामाजिक समीकरण बेहद जटिल है, यहाँ यादव, मुस्लिम, ब्राह्मण, पासवान और रविदास समुदाय की बड़ी आबादी है। 5.85 लाख की अनुमानित जनसंख्या में लगभग साढ़े तीन लाख मतदाता हैं। इस बार जन सुराज जैसे नए राजनीतिक प्रयोग भी मैदान में हैं, जिनकी मौजूदगी पारंपरिक गठबंधनों की नींद हराम कर सकती है। राजनीति से परे देखें तो लौकहा बिहार के सीमांत इलाकों की उन चुनौतियों की भी तस्वीर पेश करता है, जहाँ उपजाऊ जमीन और आस्था से भरी संस्कृति के बावजूद रोजगार और विकास अभी भी अधूरे हैं। हर साल आने वाली बाढ़ और पलायन की मजबूरी यहाँ की सामाजिक वास्तविकता है। भुतही बलान नदी छठ जैसे पर्वों पर भले आस्था का केंद्र बन जाती हो, मगर यही नदी हर बरस तबाही का कारण भी बनती है।

लौकहा की राजनीति इस बार केवल जीत-हार की कहानी नहीं होगी, बल्कि यह यह भी बताएगी कि सीमांत बिहार की जनता अब किस दिशा में सोच रही है परंपरा के सहारे या बदलाव की नई परिभाषा के साथ। यही वजह है कि इस छोटे से सीमावर्ती क्षेत्र पर पूरे बिहार की नजर टिकी है।

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