बिहार NDA में सीटों की आग, 3 दशक पुरानी दुश्मनी की लड़ाई अब तीसरी पीढ़ी तक..!

The paswan- Nitish legacy: बिहार की राजनीति में इन दिनों एनडीए के घर में आग लगी हुई है। जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार और लोजपा(रा) प्रमुख चिराग पासवान के बीच तना-तनी खुलेआम दिख रही है। लेकिन यह महज सीटों के बंटवारे का मामला नहीं है, यह कहानी है तीन दशक पुरानी दोस्ती, विश्वासघात और सत्ता की लड़ाई की।

सीटों को लेकर संग्राम, या फिर 2020 के चुनाव का जहर

सूत्रों से पता चला है कि नीतीश कुमार ने सीट शेयरिंग की सूची देखी तो आगबबूला हो गए। राजगीर और सोनबरसा जैसी आरक्षित सीटें, जहां जेडीयू का पारंपरिक वर्चस्व रहा है, चिराग के हिस्से में देखकर मुख्यमंत्री गरज उठे, ‘चिराग को यह सीट कैसे मिल सकती है? जाकर बीजेपी से बात करो.

इस बार जेडीयू और बीजेपी को 101-101 सीट मिली हैं, जबकि चिराग की लोजपा (रा) को 29 सीटें दी गई हैं। राष्ट्रीय लोक मंच और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेकुलर) को 6-6 सीटें ही मिली हैं।

नीतीश की नाराजगी बेवजह नहीं है। 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग ने एनडीए से अलग होकर स्वतंत्र चुनाव लड़ा था। जेडीयू का मानना है कि बीजेपी ने ही चिराग को उनके खिलाफ खड़ा किया था। नतीजे चौंकाने वाले थे, 32 सीटों पर लोजपा को जेडीयू से ज्यादा वोट मिले थे।इनमें से 26 सीटों पर लोजपा के वोट जेडीयू की हार के मार्जिन से ज्यादा थे। 5 अन्य सीटों पर तो लोजपा दूसरे नंबर पर रही। परिणाम यही हुआ कि भाजपा 74 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि जेडीयू सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई।

90 के दशक में शुरुआत हुई, तीन नेताओं की कहानी

90 के दशक की बात है, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार तीनों समाजवादी विचारधारा के युवा नेता थे। रामविलास सबसे आगे थे जो 1969 में अलौली (खगड़िया) से पहली बार विधायक बने थे। 1989 में वीपी सिंह की सरकार में वे केंद्रीय मंत्री बने। फिर 1977 में लालू प्रसाद यादव ने छपरा (अब सारण) लोकसभा सीट से जीत अपने नाम की। फिर 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बनकर उन्होंने राज्य की जातिगत राजनीति को नया आयाम दिया। पिछड़े और दलित वर्ग की राजनीति में एक नया युग शुरू किया। सबसे बाद में कुर्मी नेता नीतीश चुनावी मैदान में उतरे लेकिन 1985 में हरनौत विधानसभा सीट से उनकी पहली जीत हुई। 1989 में वे लोकसभा पहुंचे। रामविलास की तरह उन्हें भी वीपी सिंह ने केंद्रीय मंत्री बनाया।

जब तीनों साथियों की राहें बदलीं

तीनों नेताओं के रास्ते अलग हो गए। नीतीश पहले निकले और 1994 में जॉर्ज फर्नांडीज के साथ मिलकर जनता दल से अलग होकर समता पार्टी बनाई। लालू ने 1997 में ही राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया। रामविलास ने 2000 में लोग जनशक्ति पार्टी की स्थापना की।

2000 में मुख्यमंत्री का वो ऑफर जिसने दोस्ती तोड़ी

2015 में पासवान ने एक इंटरव्यू में अपनी प्रतिद्वंद्विता का राज खोलते हुए कहा था कि 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था। बिहार में एनडीए की जीत हुई थी, लेकिन बहुमत नहीं मिल पाया था। पासवान ने कहा कि उन्होंने यह प्रस्ताव इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। लेकिन उन्हें हैरानी तब हुई जब नीतीश ने बिना किसी हिचकिचाहट के यह पद स्वीकार कर लिया। जब कुछ दिनों बाद नीतीश विधानसभा में विश्वास मत हासिल नहीं कर सके तो पासवान अपनी खुशी छिपा नहीं पाए। कहा जाता है कि उस समय पासवान ने खुलकर अपनी प्रसन्नता जताई थी और यहीं से शुरू हुई बिहार की महान प्रतिद्वंद्विता।

2002 में रेल मंत्रालय की खटास

पासवान ने इस इंटरव्यू में यह भी स्वीकार किया कि 2002 में जब उन्होंने एनडीए छोड़ा, तो गुजरात में बीजेपी सरकार के दौरान हुए गोधरा दंगे उनकी एकमात्र वजह नहीं थे। असली बात यह थी कि बाजपाई सरकार में नीतीश को केंद्रीय रेल मंत्री बना दिया गया था, जबकि उन्हें कम महत्वपूर्ण मंत्रालय में भेज दिया गया। रेल मंत्रालय बिहार के नेताओं के लिए हमेशा से प्रतिष्ठा का विषय बना रहा है, यह अपमान पासवान को बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने एनडीए छोड़ने का फैसला कर लिया।

पासवान की 2005 की भूल, छूट गया सीएम बनने का मौका

फरवरी 2005 की विधानसभा चुनाव में लोजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था और 29 सीट जीती। चुनाव परिणाम में कोई भी पार्टी स्पष्ट बहुमत में नहीं थी, लेकिन माना जाता है कि नीतीश ने रामविलास पासवान से संपर्क किया और मुख्यमंत्री बनने के लिए समर्थन मांगा। पासवान ने किसी को भी समर्थन देने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रपति शासन लगा और नवंबर 2005 में दोबारा चुनाव हुए। नीतीश कुमार ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की और मुख्यमंत्री बने, तब से लेकर आज तक वो बिहार के मुख्यमंत्री हैं।

नीतीश का मास्टर स्ट्रोक महादलित कार्ड

2005 नवंबर में मुख्यमंत्री बनने के बाद, नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए एक चाल चली। उन्होंने महादलित श्रेणी बनाई और इसे दर्जनों सरकारी योजनाओं में लागू किया। इस महादलित श्रेणी में राज्य की सभी अनुसूचित जातियां शामिल थीं, लेकिन पासवान समुदाय को जानबूझकर बाहर रखा गया। यह नीतीश का सीधा हमला था रामविलास पासवान के वोट बैंक पर।

मोदी लहर में, 2014 में किसकी नैया डूबी?

दोनों नेताओं ने हमेशा एनडीए के साथ लचीलापन दिखाया है। 2013 में नीतीश ने एक बार फिर एनडीए छोड़ दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, राम विलास पासवान ने एनडीए में शामिल होने का फैसला कर लिया। कहा जाता है कि यह फैसला चिराग के आग्रह करने पर लिया गया था। 2014 की मोदी लहर में लोजपा ने 6 लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि जेडीयू का सफाया हो गया और वह सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई। यह नीतीश के लिए एक बड़ा झटका था, और उन्हें लगा कि एक बार फिर पासवान परिवार उन्हें चोट पहुंचाएगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में पासवान और नीतीश दोनों एनडीए के भागीदार थे, लेकिन दोनों के बीच की दूरी साफ दिखाई दे रही थी।

 

दोनों पार्टियों के बीच सिर्फ एक कामकाजी व्यवस्था ही थी, ना कोई दोस्ती, ना कोई भरोसा, लेकिन 2019 में जब पासवान जी राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने जा रहे थे।  तो नितीश कुमार बहुत अनिइच्छा से वहां पहुंचे थे। चिराग को आज भी वह दिन याद है, जब उन्हें और उनके पिता को जानबूझकर इंतजार करवाया गया था। यह सीधा अपमान था, और चिराग इसे नहीं भूल पाए हैं। यह छोटी-छोटी घटनाएं आज भी दोनों नेताओं के बीच की खाई को चौड़ा करती है। बिहार की राजनीति में या दुश्मनी अब तीसरी पीढ़ी में प्रवेश कर चुकी है।

 

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