Bihar assembly election 2025: भारत के किसी भी कोने में चले जाईए और वहां रह रहे किसी बिहार से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति से पूछिए बिहार के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा क्या है? उसका एक संक्षिप्त जवाब होगा… भैया सरकार कुछ नहीं करती। अब अगला सवाल पूछिए सरकार क्यों नहीं करती… इसका ठीक ठीक उत्तर देते हुए आपको यह बताया जाएगा कि राजनीति बड़ी गंदी है। बिहार में जातिवाद कूट कूट कर भरा हुआ है यह जबाव भी दलील देते हुए आपको बताया जाएगा। अब जब आप उससे यह पूछ ही रहे हैं तो यह भी पूछ लीजिए कि बिहार की राजनीति पर क्या टिप्पणी करना चाहेंगे… उसका जबाव होगा। बिहार की राजनीति को अगर एक शब्द में समेटना हो, तो वह है जाति।
अब सच्चाई ही ये है तो कोई क्या ही टिप्पणी करें। बिहार में जाती न केवल चुनावी रणनीति की धुरी रही है, बल्कि सत्ता की चाभी भी इसी समीकरण से निकलती रही है। मंडल की राजनीति से शुरू हुई राजनीति का यह दांव बिहार में अपने शुरुआती दौर में खामोशी से काम करता रहा और फिर हाल में हुए चुनाव तक इसका खूब असर देखने को मिला। अब जब 2025 विधानसभा चुनाव होने जा रहा है तो यह प्रवृत्ति और भी मुखर रूप में सामने आई है, विशेष रूप से 2023 में हुई जातीय जनगणना के बाद। प्रमुख दलों ने अपने-अपने कोर वोट बैंक को साधने के साथ-साथ अन्य जातीय समूहों को भी अपने पाले में लाने की होड़ शुरू कर दी है।
यादव-मुस्लिम समीकरण के पार सोच रहा RJD
तेजस्वी यादव के नेतृत्व में RJD ने 2025 में एक बार फिर अपने परंपरागत MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को प्राथमिकता दी है। लेकिन इस बार पार्टी महज अपने पारंपरिक वोटों तक सीमित हो कर नहीं रहना चाहती। आंकड़े बताते हैं कि पार्टी ने अब तक घोषित उम्मीदवारों में: RJD ने अपने पुराने MY यानी मुस्लिम (19) और यादव (51) समीकरण पर सबसे ज्यादा भरोसा दिखाया है, जो उनके कुल उम्मीदवारों का लगभग 50% है। उन्होंने बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कुशवाहा (11) और अति पिछड़े उम्मीदवारों को भी टिकट दिए है। आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि यादव-मुस्लिम के अलावा इस बार पार्टी ने अन्य OBC और ऊँची जातियों जैसे भूमिहार और राजपूतों को भी टोकन प्रतिनिधित्व देकर समावेशी होने की कोशिश की है। देखा जाए तो राजद की यह रणनीति उस वक्त में जरूरी भी लगती है जब जातीय जनगणना यह स्पष्ट करती है कि EBC और अन्य OBC की संख्या यादवों से अधिक है।
विचारधारा को प्राथमिकता दे रही BJP
बीजेपी को लेकर यह कहा जाता है कि यह अगड़ी जातियों की पार्टी है। हालांकि इसमें पूरी सच्चाई नहीं है। लेकिन इस बार के चुनाव में BJP ने इस बार अपने टिकट वितरण में एकदम स्पष्ट संदेश दिया है कि उसकी प्राथमिकता ऊँची जातियाँ हैं। आंकड़ों के अनुसार पार्टी ने सबसे ज्यादा टिकट सवर्ण वर्ग (49) को दिए हैं, जिनमें राजपूत (21) और भूमिहार (16) प्रमुख हैं। इसके अलावा, उन्होंने पिछड़ा (24) और अति पिछड़ा (16) वर्ग से भी कई उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जिनमें यादव, कुशवाहा और तेली जैसी जातियां शामिल हैं। यानी कुल 49% से अधिक टिकट इन्हीं वर्गों को दिए गए। यह BJP की उस पारंपरिक जनाधार की वापसी की रणनीति को दर्शाता है, जो बीते कुछ दिनों में नीतीश कुमार के साथ गठबंधन के दौरान पिछड़ों की राजनीति में कुछ हद तक पिघल गया था। हालाँकि, इस रणनीति का एक खतरा यह है कि यह राज्य की बड़ी आबादी OBC, EBC और SC को विमुख कर सकती है। बीजेपी ने भले ही कुछ OBC (यथा कुशवाहा, तेली, नाई) और अनुसूचित जातियों को टिकट दिए हों, लेकिन उनका प्रतिशत तुलनात्मक रूप से कम है।
पुरानी पटरी पर लौट रही JDU
EBC और खासकर महिला वोट बैंक के सहारे बीते 20 सालों से गद्दी पर रहने वाले नीतीश कुमार की पार्टी JDU ने एक बार फिर खुद को EBC और OBC वर्गों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया है। पार्टी द्वारा घोषित 101 उम्मीदवारों मे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पिछड़ा (37) और अति पिछड़ा (22) मॉडल पर जोर दिया है, जिसमें कुशवाहा और कुर्मी जाति के उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा है। उन्होंने सवर्ण (22) और दलित (10) समुदायों को भी ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व दिया है।
अब इस लिस्ट में देखें तो खास बात यह है कि कुशवाहा, कुर्मी, तेली, और मल्लाह जैसी जातियों को महत्व देकर JDU ने अपनी पुरानी पहचान सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को दोहराया है। यह वर्ग, जो जातीय जनगणना में सबसे अधिक संख्या में पाया गया है, JDU का चुनावी स्तंभ बन सकता है।
मतलब आंकड़ों को देखें तो यह साफ़ है कि कैसे सत्ता तक पहुंचने की कोशिश कर रही राजद अपने रणनीति में बदलाव कर रही है तो बीजेपी और जदयू पुरानी स्थिति में ही खुद को और सहज बनाने में जुटी है। RJD अभी भी अपने कोर वोट बैंक यादव और मुस्लिम पर निर्भर है, पर अब उसका झुकाव विस्तारित सामाजिक गठबंधन की ओर भी है। BJP की रणनीति जातीय ध्रुवीकरण पर आधारित है, जो उत्तर प्रदेश की तर्ज पर upper caste consolidation की ओर इशारा करती है। JDU खुद को सामाजिक न्याय के प्रतिनिधि के रूप में फिर से स्थापित करने की कोशिश में है ,संभवत नीतीश कुमार का यह आखिरी बड़ा दांव है। हालांकि बिहार चुनाव की परीक्षा सिर्फ पार्टी और उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस बहस की भी परीक्षा है कि क्या राज्य जाति से आगे बढ़कर विकास, रोज़गार, शिक्षा, और सुशासन को वोट देगा? या फिर एक बार फिर से जातीय पहचान ही मतदाता की दिशा तय करेगी?