गोवर्धन पूजा : दिवाली के अगले दिन पूरे भारत में गोवर्धन पूजा मनाई जाती है, लेकिन बिहार में इस पर्व का रंग और भी खास होता है। यहाँ यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि लोक परंपरा, ग्रामीण संस्कृति और सामूहिक एकता का प्रतीक बन चुका है। बिहार के गांवों में गोवर्धन पूजा का दृश्य कुछ ऐसा होता है जो श्रद्धा, सादगी और परंपरा का सुंदर संगम दिखाता है।
गोवर्धन पूजा की शुरुआत : सुबह की तैयारी
बिहार के ग्रामीण इलाकों में दीपावली की रात जैसे ही खत्म होती है, अगली सुबह से ही महिलाएं और बच्चे गोबर इकट्ठा करने में लग जाते हैं। घर-घर से गाय के गोबर को एकत्रित कर साफ आंगन में गोवर्धन पर्वत का आकार बनाया जाता है। इसे मिट्टी और गोबर से मिलाकर गोल या टेलेदार रूप दिया जाता है, जो गोवर्धन पर्वत का प्रतीक होता है।
इसके बाद उसे फूलों, पत्तों, मिट्टी के दीयों, अक्षत (चावल), हल्दी, और रंगोली से सजाया जाता है। ग्रामीण महिलाएं बड़े मनोयोग से यह कार्य करती हैं, और बच्चे भी इसमें भाग लेते हैं। यह दृश्य पूरे गांव में भक्ति और उत्साह का वातावरण बना देता है।
गोवर्धन पर्वत का निर्माण और पूजा विधि
जब गोवर्धन पर्वत तैयार हो जाता है, तो पूजा का शुभ मुहूर्त तय किया जाता है। लोग सुबह या दोपहर में पूजा करते हैं। सबसे पहले गायों की पूजा की जाती है — उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है, माला पहनाई जाती है और माथे पर तिलक लगाया जाता है। इसके बाद गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू होती है।
गांव की महिलाएं गोवर्धन के चारों ओर दीपक जलाती हैं, जल, दूध और अन्न अर्पित करती हैं। पूजा के समय भगवान कृष्ण का स्मरण किया जाता है और उनसे परिवार व पशुओं की रक्षा की प्रार्थना की जाती है। कुछ स्थानों पर कृष्ण-गोवर्धन की कथा सुनाई जाती है, जिससे बच्चे भी इस परंपरा के महत्व को समझ सकें।
अन्नकूट और प्रसाद का वितरण
पूजा के बाद अन्नकूट तैयार किया जाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं — जैसे चावल, दाल, कढ़ी, पूरी, मिठाइयाँ, और सब्जियाँ। इसे “गोवर्धन महाराज” को भोग लगाया जाता है। बाद में यह प्रसाद पूरे परिवार और पड़ोस में बांटा जाता है। यह सामूहिक भोज की तरह होता है, जहाँ हर कोई साथ बैठकर भोजन करता है, जो समानता और एकता का प्रतीक है।
बिहार की लोक मान्यताएँ और विशेषताएँ
बिहार में यह भी मान्यता है कि गोवर्धन पूजा करने से घर में समृद्धि और गौ-धन बढ़ता है। कई जगहों पर महिलाएँ अपने आँगन में बने गोवर्धन के चारों ओर परिक्रमा करती हैं और लोकगीत गाती हैं, जिनमें भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन होता है।
कुछ जिलों में, विशेषकर दरभंगा, सिवान, और भोजपुर में, पूजा के बाद बच्चे “गोवर्धन बाबा की जय” कहते हुए घर-घर घूमकर आशीर्वाद और मिठाई मांगते हैं।
आधुनिक समय में बदलती परंपरा
शहरों में भले यह परंपरा अब सीमित रूप में रह गई हो, लेकिन बिहार के गांव आज भी इसे दिल से निभाते हैं। आधुनिकता के दौर में भी यह पर्व ग्रामीण जीवन में प्रकृति और धर्म के गहरे जुड़ाव की याद दिलाता है।
बिहार की गोवर्धन पूजा केवल पूजा नहीं, बल्कि धरती, गाय और अन्न के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है। यह परंपरा बताती है कि प्रकृति की सेवा और संरक्षण ही सच्ची भक्ति है। दीपावली के इस अगले दिन, जब गांव का हर आँगन गोबर से बने गोवर्धन से सजता है, तब वास्तव में लगता है कि आस्था और संस्कृति आज भी मिट्टी की खुशबू में जिंदा है।