CWC Meeting, Patna: चुनाव हो या नहीं हो राजनीति और राजनेता कुछ वैसे ही नहीं करते..अब पटना में कांग्रेस कार्यसमिति यानी CWC की विस्तारित बैठक एक औपचारिक आयोजन भर नहीं थी। यह स्वतंत्र भारत के बाद पहली बार है जब कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक बिहार में हुई है। इस बैठक का समय और स्थान यह साफ कर देता है कि कैसे यह आयोजन औपचारिक नहीं है. बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले सदाकत आश्रम में कांग्रेस की इस बैठक का साफ संदेश है कांग्रेस अब बिहार की राजनीति में सिर्फ ‘सहयोगी’ दल नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी अलग और निर्णायक भूमिका गढ़ना चाहती है।
संगठनात्मक मजबूती बनाम राजनीतिक महत्वाकांक्षा
जानकारी के लिए बता दें कि बैठक में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी से लेकर जयराम रमेश और अजय माकन जैसे दूसरे अन्य सभी वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। बैठक के बाद मीडिया ब्रीफिंग में पार्टी के नेताओं ने कहा कि बैठक का मकसद संगठन को मजबूत करना, ब्लॉक-डिस्ट्रिक्ट स्तर पर चुनावी तैयारियां तेज करना, और हाल की वोट अधिकार यात्रा का आकलन करना था और इस पर चर्चा भी की गई लेकिन अटकले और चर्चा है कि इसका असली एजेंडा और भी गहरा था। कांग्रेस ने यह तय किया कि 2025 को संगठन सुदृढ़ीकरण वर्ष बनाया जाएगा, पर इसके पीछे राजनीतिक मंशा साफ झलकती है कि पार्टी महागठबंधन में आरजेडी की बड़े भाई वाली भूमिका को चुनौती देना चाहती है। सियासी हलकों में यह चर्चा तेज है कि कांग्रेस ने इस बैठक को तेजस्वी को घेरने का वॉर रूम बनाने की शुरुआत कर दी है। वोटर अधिकार यात्रा में आरजेडी का झंडा-बैनर गायब था, और कांग्रेस ने इसे अपने अभियान में बदल दिया। बैठक से पहले कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने यह संकेत भी दिया कि मुख्यमंत्री पद का चेहरा अभी तय नहीं है। यह बयान तेजस्वी यादव की दावेदारी पर सवाल उठाता है। यानी कांग्रेस अपने लिए सीट-बंटवारे से अधिक लीडरशिप स्पेस भी तलाश रही है।
NDA पर हमला, पर असली निशाना कौन?
CWC ने मतदाता सूची की अनियमितताओं को मुद्दा बनाया। वोट चोरी, गद्दी चोर जैसे नारों से कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि लोकतंत्र पर सबसे बड़ा खतरा मौजूदा सत्ता से नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रियाओं की धांधली से है। जिसका संकेत है कि अब चुनावी धांधली को बिहार तक नहीं राष्ट्रीय खतरे के रूप में पेश करना चाहती है। बैठक में NDA सरकार की नीतियों की आलोचना की गई। बेरोजगारी, MSME संकट, बाढ़ राहत की असंगति, विदेश नीति की विफलता, इन सभी पर कांग्रेस ने केंद्र को कठघरे में खड़ा किया। लेकिन सवाल उठता है कि कांग्रेस का असली निशाना कौन है? क्या सिर्फ मोदी सरकार या फिर महागठबंधन का वह साथी जिससे कांग्रेस को बराबरी की कुर्सी चाहिए ?
तेलंगाना मॉडल और बिहार की राजनीति
उधर तेलंगाना चुनाव 2023 को बार-बार कांग्रेस ‘सफलता की मिसाल’ के रूप में पेश करती है। वहां कांग्रेस ने BRS को एंटी-इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर धूल चटाई। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का असर भी दिखा। कांग्रेस अब बिहार में भी वही रिहर्सल करती दिख रही है। नीतीश सरकार पर बेरोजगारी और पलायन का आरोप के साथ साथ SIR वोटर लिस्ट विवाद के जरिए भी चुनाव आयोग और मौजूदा सरकार के भरोसे पर चोट कर रही है। लेकिन फर्क यह है कि तेलंगाना में कांग्रेस को अकेला स्पेस मिला था, जबकि बिहार में RJD पहले से ही स्थापित है। यहां कांग्रेस को अपनी जगह बनानी है और यही चुनौती है। इसके साथ साथ कांग्रेस तेजस्वी को ‘दिल्ली मॉडल’ में फंसाना चाहती है? दरअसल दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने AAP से दूरी बनाई और उसे अकेला चुनावी भार झेलने दिया। नतीजा AAP कमजोर हुई, बीजेपी ने फायदा उठाया। कांग्रेस का वोट शेयर थोड़ा बढ़ा, पर सीट शून्य पर ही रही। बिहार में वैसा ही प्रयोग दोहराने की तैयारी है? पार्टी की मजबूती के लिए कांग्रेस यह सोच रही होगी कि RJD के वोट बैंक (मुस्लिम + यादव + दलित) में सेंध लगाकर उसे कमजोर किया जाए, ताकि कांग्रेस मुख्य विपक्षी या सत्ता की बराबर की दावेदार बन सके?
कुल मिलाकर देखें तो पटना की CWC बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस अब बिहार में सिर्फ गठबंधन का हिस्सा नहीं, बल्कि ‘निर्णायक खिलाड़ी’ बनना चाहती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने जब-जब सहयोगियों को कमजोर करने की रणनीति अपनाई, परिणाम कभी उसके पक्ष में नहीं गए। बिहार की चुनौती कहीं अधिक जटिल है। यहां जातीय समीकरण, नेतृत्व की लड़ाई और गठबंधन की खींचतान सब कुछ एक साथ है। अब देखना होगा कि कांग्रेस का यह आत्मविश्वास वास्तविक जमीन पर उतरता है या नहीं.