Bihar Election : बिहार में चुनावी समर का ऐलान हो चुका है. इस बार राज्य में दो चरण 6 और 11 नवंबर को मतदान होंगे, जिसके नतीजे 14 नवंबर को आएगा. लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबला के असार दिख रहे हैं, और राज्य की राजनीति एक बार तीन ध्रुवों यानी कि एनडीए, महागठबंधन और जनसुराज के इर्द-गिर्द सिमटती दिख रही है। यह त्रिकोणीय मुकाबला ना सिर्फ खबरों में बल्कि जमीनी स्तर पर मुकाबला संघर्ष पुर्ण रहने वाला है. क्योंकि एक तरफ जहां हर गठबंधन के पास अपनी-अपनी ताकत है, तो चुनौतियां भी कम नहीं। मतदाता इस बार भावनाओं के बजाय ठोस मुद्दों पर ध्यान देते दिख रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि तीनों राजनीतिक खेमों की असली मजबूती और कमजोरी कहां निहित है।
एनडीए के सामने एंटी-इनकंबेंसी की चुनौती
राज्य में बीते 20 सालों से एनडीए की सरकार है लेकिन इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की योजनाओं पर भरोसा कर मैदान में उतरा है। जो एनडीए का मजबूत पक्ष है लेकिन इसके साथ साथ स्थानीय लेवल पर विधायकों के प्रति नाराजगी सबसे कमजोर पहलू है.
क्या है एनडीए का मजबूत और कमजोर पक्ष
एनडीए के पक्ष में सबसे बड़ा कारक प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और नीतीश सरकार की योजनाएं हैं। प्रधानमंत्री आवास, हर घर जल, वृद्धावस्था और दिव्यांग पेंशन, महिलाओं के लिए 10-10 हजार की सहायता योजना, मुफ्त बिजली जैसी पहल सीधे आम मतदाताओं को लाभ पहुंचाती रही हैं। इसके अलावा, लालू यादव के कार्यकाल की जंगलराज छवि आज भी एक वर्ग के मतदाताओं को एनडीए के पक्ष में एकजुट रखती है। नीतीश सरकार का युवाओं को अगले पांच साल में एक करोड़ नौकरियां व रोजगार देने का वादा भी चुनावी हथियार बना है। तो लंबे समय से सत्ता में रहने की वजह से एनडीए एंटी-इनकंबेंसी का शिकार दिख रहा है। अफसरशाही के प्रति आम लोगों की नाराजगी बढ़ी है। कई मंत्रियों और नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप एनडीए की छवि को धूमिल कर रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना और कई विधायकों के प्रति जनता का गुस्सा भी एक बड़ी चुनौती है। पिछले चुनाव में किए गए वादों के अधूरे रहने से मतदाताओं का भरोसा कमजोर हुआ है।
महागठबंधन में आंतरिक असंतोष बन रही बड़ी
महागठबंधन का सबसे मजबूत आधार सामाजिक समीकरण रहा है। मुस्लिम-यादव (MY) गठजोड़ उसे लगभग 30% वोटों की एक स्थायी जमीन देता है। लेकिन इसके साथ साथ लालू यादव के कार्यकाल की जंगलराज छवि वाला इमेज आज भी कमजोर कड़ी है. इसके साथ साथ गठबंधन में सीटों को लेकर आंतरिक असंतोष भी एक कमजोर कड़ी है.
क्या है महागठबंधन का मजबूत और कमजोर पक्ष
राजद के अलावा कांग्रेस की बढ़ी सक्रियता और राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा ने विपक्षी खेमे में ऊर्जा भरी है। युवा वर्ग में तेजस्वी यादव की छवि एक नए नेतृत्व की उम्मीद के रूप में उभरी है। उनकी लगातार दबाव की राजनीति ने नीतीश सरकार को कई योजनाएं लागू करने पर मजबूर किया, जिससे उनकी राजनीतिक साख बढ़ी है। इस बार महागठबंधन की पार्टियां अपेक्षाकृत ज्यादा एकजुट दिख रही हैं, जिससे संदेश स्पष्टता से मतदाताओं तक पहुंच सकता है। तो सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण को लेकर है। यादव और मुसलमानों को वरीयता दिए जाने से ईबीसी वर्ग में असंतोष है। दबंग समर्थकों की मौजूदगी ने कमजोर और हाशिये पर खड़े वर्गों को पार्टी से दूर किया है। टिकट न मिलने पर नेताओं के बागी होकर मैदान में उतरने की आशंका भी गहरी है। तेज प्रताप यादव का अलग पार्टी बनाना परिवार के भीतर दरार को दिखाता है। उम्मीदवार चयन में पैसों वालों का प्रभाव और सीमांचल में ओवैसी की उपस्थिति भी महागठबंधन के वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकती है।
जनसुराज के प्रयोग में चुनौती होगी संगठन की कमजोरी
प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जनसुराज पार्टी इस चुनाव में पहली बार गंभीर दावेदार के रूप में मैदान में है। हालांकि NDA और महागठबंधन की सीधी लड़ाई में स्थान बना पाना मुश्किल होगा.
क्या है जनसुराज का मजबूत और कमजोर पक्ष
प्रशांत किशोर की रणनीतिक सूझबूझ और लंबे समय तक चली पदयात्रा ने पार्टी को गांव-गांव तक पहुंचाया। युवा मतदाताओं और पारंपरिक राजनीति से निराश लोगों में पीके की छवि बदलाव के प्रतीक के रूप में बनी है। पार्टी ने भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया है और दूसरे दलों से टिकट न मिलने वाले कुछ योग्य उम्मीदवारों को भी आकर्षित किया है। तो अनुभवहीन चुनाव प्रचारक और संगठन की कमजोर पकड़ इसके लिए बाधा साबित हो सकती है। पार्टी में उन नेताओं की भीड़ है, जो एनडीए और महागठबंधन में किनारे कर दिए गए थे। टिकट वितरण के बाद असंतोष और गुटबाजी का खतरा बड़ा हो सकता है। सवर्णवादी होने का आरोप और यह धारणा कि पीके किसी और दल के लिए ‘रणनीतिक खेल’ खेल रहे हैं, मतदाताओं में संदेह पैदा करती है।
मतदाता की कसौटी पर टिकना असली चुनौती
बिहार का मतदाता अब पहले जैसा भावुक नहीं रहा। वह जातीय समीकरण से इतर रोजमर्रा की समस्याओं जैसे कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के समाधान की तलाश में है। एनडीए अपने कामकाज की थकान और एंटी-इनकंबेंसी को दूर कर पाता है या नहीं, महागठबंधन अपने वोट बैंक से परे नए वर्ग को जोड़ पाता है या नहीं, और जनसुराज खुद को ‘तीसरे विकल्प’ के रूप में कितना विश्वसनीय बना पाता है,चुनाव की दिशा इन्हीं सवालों के जवाब पर निर्भर करेगी। बिहार की राजनीति इस बार सिर्फ नारों और गठबंधन के गणित से नहीं, बल्कि नीतियों और नेतृत्व की साख से तय होगी।