NDA : भाजपा का सवर्णों पर दांव तो दूसरी पार्टी भी कम नहीं, जानिए बिहार चुनाव में कैसा है जातीय संतुलन

NDA’S Caste calculation: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने अपनी चुनावी बिसात बिछा दी है. भाजपा, जनता दल यूनाइटेड(JDU), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (LJP(R)), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) से मिलकर बने इस गठबंधन ने सभी 243 सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है. टिकट वितरण के आँकड़े साफ बताते हैं कि गठबंधन ने अपने पारंपरिक और मजबूत वोट बैंक—स्वर्णों और ओबीसी पर बड़ा दाँव खेला है.

सवर्णों पर सबसे बड़ा दाँव

गठबंधन ने सवर्ण समाज को कुल 85 टिकट (लगभग 35%) दिए हैं, जो उनकी आबादी (15.52%) के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है. सवर्णों में टिकट पाने वालों में राजपूत (37), भूमिहार (32), ब्राह्मण (14) और कायस्थ (2) शामिल हैं. यह कदम 2020 के चुनाव परिणामों पर आधारित है, जहाँ सवर्ण NDA का सबसे मजबूत आधार साबित हुए थे. (राजपूत 55%, भूमिहार 51%, ब्राह्मण 52% वोट NDA को).

ओबीसी पर पकड़ मजबूत

दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा ओबीसी (77 सीटें) को मिला है, जिसमें कुशवाहा (24), वैश्य (20), यादव (19) और कुर्मी (14) उम्मीदवार शामिल हैं. कुर्मी (81%) और कुशवाहा/कोइरी (51%) भी NDA के मजबूत वोटर रहे हैं. 19 यादव उम्मीदवारों को टिकट देना यह दिखाता है कि गठबंधन, जो पारंपरिक रूप से महागठबंधन का वोटर रहा है (83% यादवों ने 2020 में महागठबंधन को वोट दिया था), उसमें सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है.

EBC और मुस्लिमों की उपेक्षा

अति पिछड़ा वर्ग (EBC): बिहार में 36.1% आबादी होने के बावजूद EBC को केवल 36 सीटें (14.81%) मिली हैं. यह उनकी आबादी के अनुपात से आधे से भी कम है, जो एक बड़ा विरोधाभास है.

मुस्लिम समुदाय: NDA ने मुस्लिम समुदाय को केवल 5 टिकट दिए हैं (JDU-4, LJP(R)-1), भाजपा, HAM और RLM ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है, जो उन्हें टिकट वितरण में लगभग हाशिए पर रखता है.

गठबंधन के प्रमुख दलों की रणनीति

भाजपा ने अपनी लगभग आधी सीटें स्वर्णों (49) को देकर अपने पारंपरिक कोर वोटर को मजबूत किया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी ने OBC (37) को सबसे अधिक टिकट दिए हैं, जिसमें कुर्मी और कुशवाहा पर विशेष ध्यान दिया गया है. JDU ही एकमात्र पार्टी है जिसने 4 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, हालांकि यह संख्या 2020 के मुकाबले काफी कम है.

जीत का गणित या जातीय संतुलन?

NDA की यह रणनीति साफ तौर पर अपने मजबूत जनाधार को एकजुट करने और विरोधी खेमे में सेंध लगाने पर केंद्रित है. हालांकि, सबसे बड़ी आबादी वाले EBC समुदाय को कम प्रतिनिधित्व देना एक जोखिम भरा दांव हो सकता है, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह जातीय प्लस-माइनस का गणित NDA गठबंधन के लिए चुनावी जीत का समीकरण बना पाता है या नहीं.

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