Jale Assembly election : बिहार की राजनीति में मिथिलांचल हमेशा से एक खास पहचान रखता है. यह वह इलाका है जहां परंपरा और राजनीति एक साथ सांस लेती हैं. दरभंगा जिले की जाले विधानसभा सीट भी इसी मिथिला की राजनीतिक बुनावट का एक जीवंत उदाहरण है. बागमती के उत्तर में बसे इस पूर्णत: ग्रामीण क्षेत्र का नाम स्थानीय धार्मिक स्थल जलेश्वरी स्थान से जुड़ा है. हालांकि यहां की राजनीतिक धारा अब धर्म-संस्कृति से आगे बढ़कर जातीय समीकरणों और विकास के टकराव में उलझ चुकी है. बीते दिनों यह सीट काफी चर्चा में रहा. बात इतनी बढ़ गई विधायक जीवेश मिश्रा और पत्रकार विवाद मामले में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव खुद मैदान में उतर गए और मामला FIR तक पहुंच गई….खैर
राजनीतिक रूप से महत्वपुर्ण इस सीट का असली चेहरा विकास की अधूरी तस्वीर में झलकता है. कृषि प्रधान यह इलाका हर साल बागमती की बाढ़ से जूझता है. सड़कों की हालत खराब है, स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और युवाओं में पलायन आम बात है. लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में पटना, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. तीन नगर पंचायत और एक नगर परिषद होने के बावजूद जाले में शहरी सुविधाओं का अभाव है.
जाले की सामाजिक संरचना इसे हर चुनाव में एक अलग रंग देती है. यहां यादव, मुस्लिम, भूमिहार, ब्राह्मण, रविदास और पासवान समुदायों का विशेष प्रभाव है नतीजन सभी समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लेकिन 30 प्रतिशत के करीब मुस्लिम आबादी इस सीट को त्रिकोणीय मुकाबले की ओर भी ले जाती है और यही वजह है कि यहां की राजनीति का रुख कब किस ओर मुड़ जाए, कहना मुश्किल है.
स्थानीय लोग कहते है कि हमने कई बार बदलाव किया, लेकिन हालात नहीं बदले. हर चुनाव में विकास के मुद्दे सड़क, स्वास्थ्य, बाढ़ नियंत्रण और पालायन पर जोड़ रहा लेकिन नतीजा फिर जातीय समीकरणों के पलड़े में झुक गया. अब जब बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने को है, तो यहां फिर वही सवाल उठ रहे हैं, क्या इस बार वोट जाति से ऊपर उठकर विकास को मिलेगा? या फिर जातीय भट्ठी में मुद्दे एक बार फिर पिघल जाएंगे? हलांकि बाढ़, बेरोजगारी और पलायन की मार झेल रहे जाले के लोग अब सिर्फ वादे नहीं, बदलाव चाहते हैं. आने वाले चुनाव में यह तय होगा कि क्या इस बार की राजनीति में यहां विकास का तड़का लगेगा या नहीं.
चुनावी लहजे से देखें तो यह सीट लगातार तीन बार भाजपा के खाते में गई है. मौजूदा विधायक और मंत्री जीवेश कुमार मिश्रा अब चौथी बार मैदान में उतरने की तैयारी में हैं. 2020 में उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. मशकूर अहमद उस्मानी को लगभग 22 हजार मतों के अंतर से पराजित किया था. 2015 में भी उन्होंने जदयू के ऋषि मिश्रा को हराया था, जबकि 2010 में भाजपा के विजय कुमार मिश्र ने राजद को मात दी थी. यानी पिछले पंद्रह वर्षों में भाजपा का परचम यहां लगातार फहराया है. हालांकि जाले की राजनीति सिर्फ एक दल या व्यक्ति तक सीमित नहीं रही. यहां राजनीतिक परिवारों की जड़ें गहरी हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्र के पुत्र विजय कुमार मिश्र तीन बार विधायक रहे, एक बार कांग्रेस से और दो बार भाजपा से. बाद में उन्होंने भाजपा छोड़ जदयू का दामन थामा तो उपचुनाव में उनके बेटे ऋषि मिश्रा जीत गए. यह बताती है कि जाले की राजनीति में परिवार और विचारधारा दोनों साथ-साथ चलते हैं. इस बार मैदान में जनसुराज की मौजूदगी चुनाव को अलग एंगल दे रहा है. मौजूदा विधायक की लोकप्रियता पर मुद्दें हावी है तो महागठबंधन भी पूरी तैयारी कर रहा है. इन सब के साथ जनसुराज मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए मुस्लिम उम्मीदवार पर दाव लगा सकती है. ऐसे में यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा की जाले की राजनीति किस मोड़ लेती है.