Bihar assembly elections 2025: बिहार की राजनीति में मिथिलांचल का अपना एक अलग रंग और समीकरण है और दरभंगा जिले का बेनीपुर विधानसभा सीट इन्हीं राजनीतिक समीकरणों का अहम केंद्र रहा है. यह सीट न सिर्फ अपनी जातीय संरचना के कारण बल्कि बार-बार बदले समीकरणों और उम्मीदवारों की छवि को लेकर सुर्खियों में रहती है. 2025 का चुनाव करीब आते ही बेनीपुर एक बार फिर सियासी चर्चाओं के केंद्र में है.
बेनीपुर दरभंगा जिले के पूर्वी हिस्से में स्थित है. यह अर्ध-शहरी इलाका है जहां छोटे कस्बों और ग्रामीण बस्तियों का मिश्रण देखने को मिलता है. इसके पूरब में सुपौल, दक्षिण में समस्तीपुर और उत्तर में मधुबनी जैसे जिले हैं. एसएच-56 इस क्षेत्र को दरभंगा शहर से जोड़ता है. जिला मुख्यालय से बेनीपुर की दूरी करीब 30 किमी है. बेनीपुर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. यहां भगवान हनुमान मंदिर, नवादा दुर्गा मंदिर, मोहम्मदी मस्जिद और दरगाह आशापुर शरीफ जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं. कमला नदी इस क्षेत्र से होकर बहती है, जो इसे कृषि के लिहाज से उपजाऊ बनाती है. खेती-बाड़ी यहां की मुख्य आर्थिक गतिविधि है. धान, गेहूं, मक्का और दालों की पैदावार अच्छी होती है, लेकिन उद्योग-धंधों का काफी अभाव है. यही वजह है कि युवाओं को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता है. स्थानीय लोग लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास की मांग करते आ रहे हैं. लेकिन समस्या जस का तस बना हुआ है.
बेनीपुर विधानसभा क्षेत्र का गठन पहली बार 1967 में हुआ था. इसके बाद 1972 तक यहां तीन बार चुनाव हुए. 1972 के बाद परिसीमन के चलते यह सीट समाप्त हो गई और 39 साल तक चुनाव नहीं हुआ.फिर 2008 में परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बाद बेनीपुर सीट अस्तित्व में आई. 2010 के चुनाव में यहां से बीजेपी के गोपाल जी ठाकुर जीते. लेकिन 2015 में जब जेडीयू-आरजेडी गठबंधन ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा, तब यह सीट जेडीयू के खाते में गई और सुनील चौधरी ने बीजेपी को हराया. 2020 के चुनाव में जेडीयू ने फिर यह सीट बचाए रखी. इस बार विनय कुमार चौधरी कांग्रेस के मिथिलेश चौधरी को हराने में कामयाब हुए. लोजपा के प्रत्याशी कमल राम विनोद झा ने 17,616 वोट पाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया था. बेनीपुर विधानसभा के अब तक के विजेताओं पर नजर डालें तो जातीय समीकरण साफ दिखते हैं और यहां से चुने गए छह में से पांच विधायक ब्राह्मण समुदाय से रहे हैं. जिसके पीछे कोई बड़ा कारण नहीं है बल्कि बेनीपुर ब्राह्मण बहुल सीट मानी जाती है. यही वजह है कि अब तक यहां से ज्यादातर विधायक इसी समुदाय से आए.
ब्राह्मण मतदाताओं का निर्णायक असर यहां के चुनावों पर स्पष्ट दिखता रहा है. हालांकि इस बार हालात कुछ अलग दिख रहे हैं. युवाओं और स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर असंतोष है कि पिछले 15 सालों से बाहरी उम्मीदवारों ने यहां प्रतिनिधित्व किया है. लोग अब स्थानीय उम्मीदवार की मांग कर रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि बीते 5 चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार पर दांव लगाना किसी भी पार्टी के लिए सकारात्मक परिणाम नहीं रहा. 2008 में फिर से बहाल होने के बाद से बेनीपुर बाहरी नेताओं का ही गढ़ रहा है. गोपाल जी ठाकुर, सुनील चौधरी और विनय कुमार चौधरी तीनों ही विधायक बाहर से आते रहे. स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये विधायक चुनाव जीतने के बाद जनता से कट गए और विकास कार्यों की उपेक्षा की. यही वजह है कि जनता अब जाति और पार्टी से इतर किसी ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है जो क्षेत्र के मुद्दों को समझे और उनका समाधान करे.
2025 में एनडीए को यहां बड़ी चुनौती दिखती नहीं है, खासकर तब जब लोजपा फिर से गठबंधन में शामिल हो गई है. लेकिन बीजेपी इस बार सीट पर दावा कर सकती है. वहीं, राजद और उसके सहयोगियों के लिए यह सीट कठिन चुनौती पेश करती है क्योंकि पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण यहां निर्णायक नहीं है. यहां से कई उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश में लगे हैं. लेकिन मौजूदा विधायक विनय चौधरी की दावेदारी सबसे मजबूत है. वहीं महागठबंधन से कांग्रेस के मिथिलेश चौधरी का टिकट भी लगभग फाइनल है लेकिन मदन मोहन झा भी लाइन में लगे हुए हैं. हालांकि अगर यह सीट राजद के खेमे जाती है तो कमल विनोद नारायण झा यहां से प्रत्याशी हो सकते हैं. जनसुराज भी प्रयास कर रहा है लेकिन जमीन पर उतनी चर्चा नहीं हैं. कुल मिलाकर देखा जाएं तो बेनीपुर के मतदाता स्थानीय उम्मीदवार को लेकर मुखर हैं. उनका कहना है कि जाति और पार्टी की राजनीति ने क्षेत्र के विकास को पीछे छोड़ दिया है.