Editorial Opinion : बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो चुकी है और राजनीतिक दलों ने अपने-अपने सियासी मोहरे सजाने शुरू कर दिए हैं। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इसके बीच एक बड़ा कदम उठाते हुए 77 वर्षीय मंगनी लाल मंडल को पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष (RJD Bihar President) नियुक्त किया है। पार्टी का यह निर्णय न सिर्फ संगठनात्मक बदलाव है, बल्कि इस नियुक्ती के ओट में तेजस्वी यादव की दूरगामी रणनीति का उघार हो रहा है। मंगनी लाल मंडल की नियुक्ति कई सवालों को जन्म देती है, जो इशारा कर रहा है कि कैसे राज्य की राजनीति में जातीय और सामाजिक एंगल को नकारा नहीं जा सकता…इसलिए तो विकास की राजनीति का दावा करने वाले तेजस्वी भी जातिवाद पर दांव लगा रहे हैं….खैर सवाल यह है कि क्या यह बदलाव सिर्फ अनुभव की तलाश है या इसके पीछे जातीय समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोई बड़ी योजना है? इस लेख में हम आपको आरजेडी के इस फैसले (RJD Bihar President) के पीछे के राजनीतिक मायनों को समझाने की कोशिश करेंगे।
आरजेडी ने जहां राजनीति में तेजस्वी यादव के युवा चेहरे पर दांव खेला है, वहीं संगठन की कमान 77 साल के वरिष्ठ नेता को सौंपी है। हालांकि मंगनी लाल मंडल कोई सामान्य नेता नहीं, बल्कि लालू यादव के समकालीन हैं। कर्पूरी ठाकुर के राजनीतिक सान्निध्य में पले-बढ़े मंडल तीन बार विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं और मंत्री पद भी संभाल चुके हैं। लेकिन क्या मंगनी लाल मंडल को पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करना सिर्फ अनुभव का लाभ लेने के लिए है? शायद नहीं। क्योंकि राजनीतिक जानकार जो कहते है उसके मायने अलग है…मंडल धानुक जाति से आते हैं जो कि बिहार के अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में आती है।राज्य सरकार द्वारा किए गए हालिया जातिगत सर्वे के अनुसार, बिहार में EBC की जनसंख्या करीब 36.01% है, जो दूसरे किसी भी वर्ग से कहीं अधिक है। EBC में धानुक समुदाय अकेले 2.14% है। ज्ञात हो कि नीतीश कुमार की राजनीति का आधार हमेशा EBC समुदाय रहा है। खासकर कुर्मी, कुशवाहा और धानुक जातियों का उनका मजबूत गठजोड़ रहा है। ऐसे में तेजस्वी का ये कदम साफ संकेत देता है कि आरजेडी अब नीतीश के सामाजिक आधार में सीधी सेंधमारी की तैयारी कर चुका है। मंगनी लाल मंडल इस सेंध का केंद्रबिंदु हैं। गौरतलब है कि यह पहली बार है जब बिहार में किसी पार्टी ने EBC वर्ग के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जो महज प्रतीकात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक संदेश है।
मंगनी लाल मंडल (Mangni Lal Mandal) का एक और बड़ा प्लस प्वाइंट है,उनकी क्षेत्रीय पहचान। मंडल मिथिलांचल, खासकर मधुबनी और झंझारपुर क्षेत्र से आते हैं। यह वही इलाका है जहां आरजेडी की उपस्थिति बीते चुनावों में कमजोर रही है और लोकसभा की तरह विधानसभा में भी तेजस्वी की रणनीति साफ है कि जहां पार्टी कमजोर है, वहां ऐसे चेहरे आगे किए जाएं जो जमीन से जुड़े हों और स्थानीय प्रभाव रखते हों। मंडल की नियुक्ति उसी कड़ी का हिस्सा है। साथ ही पचपनिया (EBC की 55 उपजातियां) वोट बैंक में असर डालना भी इस नियुक्ति का लक्ष्य है। ज्ञात हो कि 2024 के लोकसभा चुनाव में तेजस्वी ने कुछ नए जातीय प्रयोग किए थे। उन्होंने कुशवाहा समुदाय से आने वाले अभय कुशवाहा को औरंगाबाद से टिकट दिया और जीत दर्ज की। यही नहीं, सासाराम, आरा, बक्सर जैसे इलाकों में एनडीए के जातीय समीकरण बिखर गए। अब उसी ‘ब्लूप्रिंट’ को विधानसभा चुनाव में विस्तार देने की तैयारी है। आरजेडी का फोकस अब ‘EBC+MY (मुस्लिम-यादव)’ समीकरण के बजाय ‘EBC+MY+Region Specific Leadership’ की ओर जाता दिख रहा है।
इस नियुक्ति (RJD Bihar President)का एक पहलू आंतरिक राजनीति से भी जुड़ा है। मंगनी लाल मंडल की नियुक्ति से पुराने समाजवादी चेहरों को सम्मान देने का संदेश दिया गया है, साथ ही पार्टी में बढ़ती युवा बनाम बुजुर्ग खेमेबाजी को संतुलित करने का प्रयास भी किया गया है। जगदानंद सिंह की जगह मंडल को लाकर तेजस्वी ने एक तरफ ‘बुजुर्गों का सम्मान’ और दूसरी ओर ‘राजनीतिक नियंत्रण’ दोनों को साधा है। मंगनी लाल मंडल की नियुक्ति एक संकेत है कि तेजस्वी यादव सिर्फ चेहरे नहीं बदल रहे, बल्कि एक गहरी चुनावी पटकथा लिख रहे हैं। ये महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के राजनीतिक आधार पर एक सीधा हमला है। अब सवाल यह है कि क्या मंडल जैसी शख्सियत तेजस्वी के इस प्रयोग को सफल बना पाएंगे? क्या मिथिलांचल में आरजेडी फिर से खड़ी हो सकेगी? और सबसे बड़ा सवाल क्या EBC मतदाता तेजस्वी की ओर झुकेंगे? इसके जवाब तो चुनावी नतीजे देंगे, लेकिन इतना तय है कि तेजस्वी ने अपने अगले दांव के लिए बिसात बिछा दी है। मंगनी लाल मंडल उस बिसात के केंद्र में हैं।
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