Maithili Thakur : सुरों से सियासत का सफर …चुनावी संघर्ष में कहा तक पहुंची मैथली ?

Alingar Vidhansabha : बिहार विधानसभा चुनाव के लिए इस बार दो चरण में मतदान होना है. इससे पहले बिहार की राजनीति में खूब हलचल देखी जा रही है. चुनावी तारीखों के ऐलान के साथ ही राजनीति में एंट्री करने वाली मैथिली ठाकुर को लेकर सियासी गलियारों में उठी हलचल अब भी जारी है . कभी लोकगायन से देश-दुनिया में मिथिला का गौरव बढ़ाने वाली यह युवा आवाज़, अब सत्ता के गलियारों में अपनी पहचान बनाने की कोशिश में है. अब जब मतदान की तारीख में महज कुछ दिन बचा हुआ है और चुनावी शोर में अपनी आवाज बुलंद कर रही है तो सवाल यह है कि 25 साल की यह नौजवान कलाकार, जो अब एक राजनेत्री बन चुकी है, राजनीति की इस जटिल दुनिया में अब तक कहां पहुंची है?

मैथिली ठाकुर की राजनीति में एंट्री जितनी अप्रत्याशित थी, उतनी ही चर्चित भी रही. लोक गायिका के रूप में उनकी पहचान बेहद साफ़ और लोकप्रिय रही है, लेकिन जब उन्होंने चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया, तो विवादों का सिलसिला भी शुरू हो गया.  क्या एक गायिका, जो राजनीति की बारीकियों से अनभिज्ञ है, इस सख्त और पेचीदा दुनिया में खुद को साबित कर पाएगी? जैसे सवाल उठने लगे. राजनीतिक विरोधियों ने इसे पब्लिसिटी स्टंट कहते नजर आए तो समर्थकों ने इसे मिथिला की बेटी का सशक्त कदम बताया. लेकिन मैथिली ने आलोचनाओं को नजरअंदाज कर मैदान में डटे रहना चुना.

मैथिली ने शुरुआत से ही समझ लिया था कि भले ही राजनीति में भाषणों का बड़ा मोल होता है लेकिन यह सिर्फ यही तक सीमित नहीं होता. राजनीति जनसर्थन से समृद्ध होता है. भले ही मैथिली के लिए नया हो लेकिन भीड़ से उनका पुराना नाता है. मैथिली जानती है कि लोगों को कैसे अपनी ओर खीचना है. तो उन्होंने अपने सुरों को ही राजनीतिक साधन बना लिया है. जहां अन्य नेता मंचों पर भाषणों से भीड़ जुटाते हैं, वहीं मैथिली अपनी गायकी से जनता को जोड़ती हैं. उनकी सभाओं में लोग सिर्फ सुनने नहीं, बल्कि लोग उन्हें देखने भी आते हैं. यह भीड़ भले ही पूरी तरह समर्थक न हो, लेकिन भीड़ राजनीति में प्रतीक होती है ताकत की. और मैथिली यह प्रतीक बखूबी गढ़ रही हैं. फिर जब एक बार भीड़ जमा हो गई तो मैथिली अपनी बातें कह जाती और अपने लिए समर्थन की अपील भी कर जाती.

भले ही मैथिली अलिनगर की नहीं है, लेकिन वो भी  मिथिला की धरती से ही आती हैं, उसी की बोली बोलती हैं, उसी संस्कृति की वेशभूषा पहनती हैं और उसी लोकगंध में सांस लेती हैं. यही कारण है कि जब वे किसी जनसभा में जाती हैं, तो वहां का माहौल सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि भावनात्मक हो जाता है. उनका सांस्कृतिक जुड़ाव उन्हें बाहरी होने के आरोपों से बरी कर देता है. जिसका असर हो रहा है कि मिथिला की सादगी, परिधान और पहचान के साथ वे मतदाताओं के दिल में जगह बना रही हैं.राजनीति में नया चेहरा होना अपने आप में चुनौती है. मैथिली यह समझती हैं कि राजनीति केवल मंच पर गाना या जनता को प्रभावित करना नहीं है, बल्कि रणनीति, धैर्य और समझदारी का खेल है. इसलिए बीते दिनों उन्होंने जिस तरह से स्थानीय मुद्दों पर बोलना शुरू किया है, उससे साफ है कि वे राजनीतिक रूप से परिपक्व होना चाह रही हैं. अब वे जानती हैं कि कब भावनात्मक अपील करनी है, कब मुद्दे पर बोलना है और कब चुप रहना है.

हालांकि मैथिली ठाकुर के राजनीतिक सफर में सबकुछ आसान नहीं है. विरोध अब भी कायम है. कुछ लोग उन्हें बाहरी मानते हैं, कुछ कहते हैं कि राजनीति में उनका अनुभव कम है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जितना विरोध बढ़ रहा है, उतनी ही चर्चा भी हो रही है. वह मीडिया में हैं, जनता के बीच हैं और अपने क्षेत्र की हर छोटी-बड़ी गतिविधि में सक्रिय हैं. राजनीति में यही तो चाहिए होता है.  राजनीति में जीत-हार अंतिम सत्य नहीं होती, असली जीत होती है जनता के दिल में जगह बनाना. मैथिली ठाकुर इस दिशा में आगे बढ़ रही हैं.उनकी राजनीतिक यात्रा अभी शुरुआती दौर में है तो हो सकता है आने वाले चुनाव परिणाम उनकी उम्मीदों के मुताबिक़ न हों, लेकिन यह तय है कि मिथिला की इस बेटी ने राजनीति के मंच पर एक नई धुन छेड़ दी है.

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