Bihar assembly election 2025: बिहार की सियासत में एक बार फिर अजीब सा करिश्मा है, गठबंधन बदलते रहे,सहयोगी दल बदलते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले 20 सालों से सत्ता की कुर्सी पर अपना कब्जा बना रखे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का ऐलान हो चुका है, और चुनाव आयोग ने दो चरणों में मतदान कार्यक्रम घोषित कर दिया है. 6 नवंबर को पहले चरण में और 11 नवंबर को दूसरे चरण में मतदान होगा. वही 14 नवंबर को चुनाव के नतीजे घोषित होंगे. यह चुनाव कई मायनों में अहम है, क्योंकि 2003 के बाद पहली बार बिहार की वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनिरीक्षण (SIR) किया गया है, जिसमें मतदाताओं की संख्या 7.43 करोड़ हो गई है.
बिहार में एक बार फिर एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला होने जा रहा है. एनडीए में भाजपा, जेडीयू, लोजपा (रामविलास) और हम जैसी पार्टियों शामिल है, जबकि इंडिया गठबंधन में राजद, कांग्रेस, वीआईपी और बम दलों की पार्टियां है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2005 से सत्ता में है, और इस बार उनके सामने कठिन चुनौती है. वहीं राजद के तेजस्वी यादव जो कभी नीतीश कुमार के डिप्टी थे आज उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस की राहुल गांधी के बीच में भी कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा, 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी, राजस्थान और महाराष्ट्र में बीजेपी को झटका लगा था, लेकिन बिहार में एनडीए मजबूत रहा था, अब सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में क्या होगा?
वहीं अगर नजर डालें कि पिछले पांच चुनाव में बिहार की सियासी पहेली में क्या हुआ
2020: राजद सबसे बड़ी पार्टी फिर भी सत्ता से दूर
2020 का चुनाव नतीजा हैरान करने वाला था. राजद 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सरकार एनडीए की बनी. बीजेपी को 74 सीटें मिलीं, जबकि जेडीयू महज 43 सीटों पर सिमट गई. कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं. वोट शेयर देखें तो राजद को 23.11%, बीजेपी को 19.46 %, जेडीयू को 15.39% और कांग्रेस को 9.48% वोट मिले. यह चुनाव साबित करता है कि सीटें ही सरकार बनाती हैं, वोट प्रतिशत नहीं.
2015: महागठबंधन का जलवा बीजेपी को मिला करारा झटका
2015 का चुनाव बिहार की सियासत का टर्निंग पॉइंट था नीतीश कुमार ने भाजपा छोड़कर लाल यादव और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया था नतीजा धमाकेदार रहा – राजद को 80 सीटें, जेडीयू को 71 सीटें और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं. बीजेपी महज 53 सीटों पर सिमट गई. दिलचस्प बात यह थी कि वोट प्रतिशत में बीजेपी सबसे आगे थी (24.4%), लेकिन सीटें कम मिलीं. नीतीश कुमार सीएम बने और तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम. लेकिन यह रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चला.
2010: जेडीयू का स्वर्णिम दौर
2010 नीतीश कुमार की लोकप्रियता की सीमा चरम पर थी. जेडीयू को 115 सीटें मिलीं और वह बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनी. बीजेपी को 91 सीटें मिलीं. राजद का सूपड़ा साफ हो गया – महज 22 सीटें मिली, कांग्रेस को 4 और लोजपा को 3 सीटें मिलीं. वोट प्रतिशत में जेडीयू को 22.58%, राजद को 18.84% और बीजेपी को 16.49% वोट मिले. यह नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ का दौर था.
अक्टूबर2005: नीतीश युग की शुरुआत
अक्टूबर 2005 में जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन सत्ता में नजर आई. जेडीयू को 88 सीटें और बीजेपी को 55 सीटें मिलीं. राजद को 54 सीटें मिलीं, लेकिन लालू यादव का 15 साल का शासन खत्म हो गया. यहीं से नीतीश कुमार के शासन की शुरुआत हुई. वोट प्रतिशत में को 23.45 प्रतिशत, जेडीयू को 20.46%, बीजेपी को 15.65% और लोजपा को 11.1% वोट मिले थे.
फरवरी2005: लालू युग का अंत करीब
फरवरी 2005 का चुनाव बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल का संकेत था, राजद को 75 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार नहीं बन पाई. जेडीयू को 55 सीटें, बीजेपी को 37 सीटें, लोजपा को 29 सीटें और कांग्रेस को 10 सीटें मिलीं. राष्ट्रपति शासन लगा और फिर अक्टूबर में दोबारा चुनाव हुए. वोट शेयर में आरजेडी को 25.97% वोट मिले थे, लेकिन सीटें कम रहीं.
इस बार का चुनाव एक का एक्स फैक्टर युवा मतदाता है. एसआईआर के बाद बिहार में अब 7.43 करोड़ मतदाता हैं. 3.92 करोड़ पुरुष और 3.50 करोड़ महिलाएं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि 18-19 साल के 14.01 लाख पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदाता हैं, और 20-29 साल के 1.63 करोड़ युवा मतदाता हैं। ये युवा वोटर किस तरफ झुकेंगे, यह इस चुनाव का सबसे बड़ा सस्पेंस है. दिव्यांग मतदाताओं की संख्या 7.20 लाख है.
पिछले 20 सालों में नीतीश कुमार ने हर तूफान को झेला है. 2025 में क्या वह फिर से कमाल कर पाएंगे या तेजस्वी यादव की युवा लहर उन्हें उखाड़ फेंकेगी? अब देखना दिलचस्प होगा कि 14 नवंबर को नतीजे किस तरफ झुकते हैं.