वोट बैंक तक सीमित है JDU – RJD की मुस्लिम पॉलिटिक्स …17 फीसदी भागीदारी वाले बिहार में हासिए पर राजनीति !

Muslim candidates in Bihar election: बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही एक बड़ा सवाल फिर से चर्चा में आ गया है. राज्य में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का आंकड़े बताते हैं कि बिहार की 17 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी के बावजूद विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व लगातार आधे से भी कम रहा है.

तीन दशकों का लेखा जोखा

1990 के बाद हुए पिछले आठ विधानसभा चुनाव के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. राज्य के कुल विधायकों में मुस्लिम सदस्यों की औसत संख्या में 8 फीसदी के आसपास रही है.

सबसे कम प्रतिनिधित्व 1990 में 

जब लालू प्रसाद पहली बार मुख्यमंत्री बने और जनता दल ने 324 में से 122 सिम जीती तब महल 18 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बन पाए थे यह सदन का सिर्फ 5.55% अब तक का सबसे कम मुस्लिमों उम्मीदवारों का आंकड़ा था.

1995 में बढ़ा प्रतिनिधित्व 

1995 में यह प्रतिनिधित्व पढ़कर 7.9% हो गया जब 23 मुस्लिम विधायको को चुना गया, इसमें अधिकतम 13 जनता दल से, 5 कांग्रेस से और बाकी अन्य दलों से थे.

2000 में अभिवाजित बिहार का आखिरी चुनाव

अभिवाजित बिहार के 2000 के विधानसभा चुनाव में 324 सदस्य सदन में, कुल 30 मुस्लिम विधायक चुने गए थे. (9.25%) इनमें से सबसे ज्यादा 17 मुस्लिम विधायक राजद के चुनाव चिन्ह पर चुने गए थे. यह लालू प्रसाद द्वारा 1997 में जनता दल से अलग होकर बनाई गई राजद का पहला विधानसभा चुनाव था.

2005 के 24 मुस्लिम विधायक 

2005 फरवरी में 24 मुस्लिम विधायक चुने गए थे. जिनमें राजद के 11, जेडीयू के 4, कांग्रेस के 3 और अन्य दलों के विधायक शामिल थे. हालांकि इस चुनाव में कोई सरकार नहीं बन पाई थी, और बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था.

2010 में एकमात्र मुस्लिम विधायक 

2010 में एक दिलचस्प घटना हुई भाजपा की सबा जफर पूर्णिया की अमोर विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुल जलील मस्तान को हराकर विधायक बनी थी.

2015 जब बढ़ा प्रतिनिधित्व

2015 के चुनाव में सबसे अधिक 9.87% मुस्लिम नेता विधानसभा पहुंचे 2015 में 24 मुस्लिम उम्मीदवार चुने गए थे. जिनमें राजदा के 12, कांग्रेस के 6 और जेडीयू के 5 विधायक शामिल थे.

2020 में जब राजद ने मारी बाजी

243 सदस्य बिहार विधानसभा ने 2020 के चुनाव में 19 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बनाएं यानी 7.81% प्रतिनिधित्व. इनमें सबसे ज्यादा 8 विधायक राजद के थे, उसके बाद एआईएमआईएम के 5, कांग्रेस के 4, और बसपा एवं सीपीआई(माले) लिबरेशन के एक एक विधायक थे. दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जेडीयू ने 11 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन सभी चुनाव हार गए यह जेडीयू के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि 2010 में पार्टी ने 14 मुसलमान को मैदान में उतारा था और 6 आसानी से जीत गए थे.

नीतीश कुमार का दौर

नवंबर 2005 से बिहार सरकार की बागडोर संभालने वाले नीतीश कुमार ने बारी–बारी से एनडीए और महागठबंधन के साथ गठबंधन बनाए हैं. उनके कार्यकाल में मुस्लिम प्रतिनिधित्व में उतार चढ़ाव देखा गया है, 2005 के अक्टूबर नवंबर चुनाव में केवल 16 मुसलमान उम्मीदवार चुने गए थे(6.58%) जो फरवरी 2005 की तुलना में काफी कम था.

2025 के चुनाव में घटी संख्या

इस बार राजद, कांग्रेस वामदल और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) वाले विपक्ष महागठबंधन और बीजेपी जेडीयू के नतृत्व वाले सत्तारूढ़ एनडीए दोनों ने 2020 के मुकाबले कम मुस्लिम उम्मीदवार उतारे है. राजद ने 143 उम्मीदवारों में 18 मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है. कांग्रेस ने 10 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं. भाकपा (माले) लिबरेशन ने 2 मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है. मुकेश साहनी की वीआईपी ने किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. जेडीयू ने अपने 101 उम्मीदवारों में से केवल 4 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. हालांकि 2020 में जदयू का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीत पाया था इसलिए शायद पार्टी ने इस पर अपनी रणनीति बदली है. चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) ने अपनी 29 सीटों में से केवल एक किशनगंज की बहादुरगंज सीट से मोहम्मद कलीमुद्दीन को मैदान में उतारा है.

क्या कहते है आंकड़े

पिछले तीन दशकों के आंकड़ों से साफ है कि बिहार में मुस्लिम प्रतिनिधित्व हमेशा जनसंख्या के अनुपात से कम रहा है. जहां उनकी आबादी 17.7% है. वही औसत प्रतिनिधित्व 8% के आसपास ही रहा है. इस बार दोनों गठबंधन द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या कम करने से यह अंतर और बढ़ सकता है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि 14 नवंबर को नतीजे में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का झुकाव किस तरफ जाता है.

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