Maithili Thakur : एक दिन पहले राजनीति में एंट्री करने वाली मिथिलांचल की लोकप्रिय लोक गायिका मैथिली ठाकुर को भाजपा ने दरभंगा के अलीनगर विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी बनाया.जिसका स्थानीय स्तर पर खूब विरोध हुआ लेकिन नामांकन के साथ साथ मैथिली के प्रति लोगों का यह आक्रोश सहानुभूती में बदलता दिखा. मैथिली का राजनीति में प्रवेश उस परसेप्शन की कहानी है जो इस देश में हर चुनाव से पहले जन्म लेती है. दरअसल राजनीति में हार और जीत अक्सर परसेप्शन तय करता है. यह वही परसेप्शन होता है जो कभी किसी नेता को लहर में बदल देता है तो कभी किसी संगठन की मेहनत को मिट्टी में मिला देता है. कभी यह किसी बाहरी उम्मीदवार के खिलाफ बनता है, कभी किसी दल-बदलू नेता के समर्थन में. अलीनगर विधानसभा सीट पर बीजेपी की प्रत्याशी मैथिली ठाकुर के नाम को लेकर जो परसेप्शन बीते दिनों बना, वह धीरे-धीरे बदलता दिख रहा है. महज कुछ ही घंटों में मैथिली को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध से स्वागत तक का यह सफर, अपने उम्मीदवार के प्रति पार्टी संगठन और उसके अंदर की राजनीतिक मनोविज्ञान का प्रतिबिंब है.
मैथिली का ब्रांड वैल्यू बिहार की सीमाओं से परे है. वह सोशल मीडिया पर करोड़ों दर्शकों के बीच एक सांस्कृतिक प्रतीक हैं, मिथिला की आवाज हैं. पार्टी ने इसी जनप्रीयता को राजनीतिक पूंजी में बदलने की कोशिश की.लेकिन स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में सवाल यह था कि क्या सिर्फ लोकप्रिय चेहरा होना पर्याप्त है? क्या लोकप्रियता स्थानीयता पर भारी पड़ सकती है? जब भाजपा ने प्रत्याशी के तौर पर मैथिली ठाकुर के नाम का एलान किया तो उनकी पहली चुनौती यही थी कि उनके खिलाफ बाहरी कहे जाने वाले परसेप्शन को तोड़ना. जनता तक यह परसेप्शन बाद में पहुंचा पहले तो पार्टी के भीतर ही विरोध के स्वर उठने लगे. स्थानीय कार्यकर्ताओं ने दिल्ली और पटना में बैठे नेताओं पर संगठन का स्थानीय ढांचा को अंदेखा कर नाम थोपने का आरोप लगाते हुए पद की जिम्मेदारी से हटने की बात भी कही पर राजनीति में यह नई बात नहीं है. टिकट बंटवारे को लेकर हर चुनाव में ऐसे असंतोष पनपते हैं. अंतर बस इतना होता है कि यह कितने लंबे समय तक चलता है और पार्टी कैसे उसे शांत करने में कामयाब होती है और भाजपा इस काम में माहिर तो है ही. अलीनगर में भी यही हुआ अपने बागी नेताओं को संगठन ने समझाया, शीर्ष नेतृत्व ने संदेश दिया और विरोध धीरे-धीरे ठंडा पड़ गया.
इतना ही नहीं नामांकन के बाद मैथिली ठाकुर पहुंची संजय कुमार सिंह उर्फ पप्पू सिंह के घर, जहां प्लानिंग के तहत माहौल पूरी तरह बदला हुआ था. कार्यक्रम में बीजेपी के तमाम वरिष्ठ नेताओं, स्थानीय सांसद, अलीनगर के सातों मंडल अध्यक्षों, पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था. लेकिन सबसे ध्यान आकर्षित करने वाली बात यह रही कि उन्हें देखने के लिए भारी संख्या में आम लोग भी उमड़े. यह वही पप्पू सिंह थे, जिन्हें लेकर कुछ दिन पहले तक बागी तेवर की चर्चा थी. पार्टी ने पहले उन्हें मनाया और फिर मैथिली ठाकुर को जनता से सीधे संवाद का मंच देने के लिए उनके आवास को कार्यक्रम स्थल बनाया. जहां पहली बार मैथिली ठाकुर अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं और जनता से आमने-सामने हुईं. दिलचस्प यह भी रहा कि उसी कार्यक्रम में वे तमाम कार्यकर्ता मौजूद थे जो कुछ दिन पहले तक मैथिली के टिकट पर नाराजगी जता रहे थे. जो स्थानीयता का नारा दे रहे थे, जो मैथिली को पैराशूट लैंडिंग बता रहे थे, जो मानते थे कि पार्टी ने उनके साथ अन्याय किया है , वही कार्यकर्ता अब मंच के नीचे मैथिली ठाकुर जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे.
नामांकन के बाद पहली बड़ी जनसभा में मैथिली ठाकुर जब मंच पर पहुंचीं, तो भीड़ के साथ वो भी जोश में थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक हल्की झिझक साफ दिख रही थी. भाषण के दौरान उन्होंने कई बार यह संकेत दिया कि यह क्षेत्र उनके लिए नया है और वह अभी राजनीति में सीखने के दौर में हैं जो सच भी है. उनका भाषण बार बार यह बता रहा था कि इस मंच पर वो सहज नहीं है. वह मोबाइल में लिखे नोट्स से पढ़ रही थी, बीच-बीच में रुक जाती, मुस्करा कर भीड़ को देखतीं, फिर शब्द तलाशतीं. इस दौरान मैथिली ने अपनी गायकी से समा बनाने की कोशिश. जहां साफ झलक रहा था कि मैथिली ठाकुर भले राजनीति के मंच पर आई हों, लेकिन उनकी आत्मा अब भी संगीत से ही जुड़ी है.
बाहरी बनाम स्थानीय के सवाल पर मैथिली ने बड़ी सादगी से कहा ,मैं अलीनगर की बेटी हूं, मेरी नानी का घर यहीं है, मैं इस धरती की भगिनी हूं. अब देखा जाए तो दरभंगा और अलीनगर के बीच की दूरी लगभग 45 किलोमीटर है और मैथिली का ननिहाल खराजपुर और अलीनगर दो अलग अलग विधानसभा सीट है. लेकिन यही तो राजनीति है. मतलब की भावनात्मक लगने वाला यह बयान राजनीतिक दृष्टि से रणनीतिक है . इससे उन्होंने स्थानीयता के सवाल को व्यक्तिगत अपनत्व से जोड़ दिया और अपने खिलाफ जारी विरोध को धीरे-धीरे समर्थन में बदलने की कोशिश की. नही तो कल तक जो लोग मैथिली वापस जाओ कह रहे थे, वही अब हमारी नेता कैसी हो, मैथिली ठाकुर जैसी हो के नारे लगा रहे थे. राजनीति की सबसे बड़ी खूबी और अजीब बात यही है कि यह दोमुंहे सांप की तरह होती है, कब कौन-सा चेहरा दिखा दे, कोई नहीं जानता.
दरअसल, बीजेपी ने मैथिली ठाकुर पर दांव लगाकर दो बातें साधने की कोशिश की है पहली, युवाओं और महिलाओं के बीच एक नया चेहरा पेश करना. दूसरी, मिथिला क्षेत्र में सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक विस्तार में बदलना.पार्टी जानती है कि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों के साथ-साथ भावनात्मक अपील पर भी टिकी होती है और मिथिलांचल में मैथिली ठाकुर उस भावनात्मक अपील जैसे भाषा, लोक संस्कृति और मिथिलांचल की अस्मिता की प्रतिनिधि हैं. हालांकि लोकप्रियता उन्हें राजनीति के मंच तक ले आई है, लेकिन जमीन जीतने के लिए उन्हें अपने गीतों से ज़्यादा जनता की नब्ज़ को समझना होगा. जनता की उंगलियों के इशारे पर नाचने वाले नेता, जब जनता की नब्ज नहीं पकड़ पाते, तो उनकी ताल बदल जाती है. मैथिली के लिए अब असली सुर यहां से शुरू होता है. जहां कमान किसी पार्टी या संगठन के हाथ में नहीं बल्कि जनता के हाथ में होती है. अगर वो यहां चुक गई तो फिर चुक गई.
मैथिली ठाकुर ने अलीनगर विधानसभा सीट से नामांकन दाखिल कर औपचारिक रूप से राजनीति में कदम रख दिया है. बीजेपी ने उन्हें अपने प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा है. अब इस सीट पर उनका सीधा मुकाबला राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के उम्मीदवार विनोद मिश्रा से होगा.