Nitish Kumar : बीते 24 अक्टूबर को समस्तीपुर की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस बार बिहार में भी नीतीश बाबू के नेतृत्व में एनडीए जीत के अपने पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ने वाला है. बिहार एनडीए को अब तक का सबसे बड़ा जनादेश देगा. यह बयान सुनने में उत्साहजनक है, लेकिन इसके भीतर छिपे राजनीतिक संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मोदी ने 45 मिनट के भाषण में बार-बार एनडीए की जीत की बात तो की, मगर एक बार भी फिर से नीतीश सरकार जैसा नारा नहीं दोहराया. यह वही प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने 2020 के विधानसभा चुनाव में हर मंच से कहा था कि अबकी बार नीतीश सरकार, तब भाजपा और जदयू के रिश्ते अपने चरम पर थे. लेकिन 2025 के चुनावी माहौल में यह तालमेल उतना आत्मीय नहीं दिखता.
प्रधानमंत्री का यह रुख महज शब्दों का फेर नहीं, बल्कि भाजपा की रणनीतिक दिशा में बदलाव का संकेत देता है. पांच साल पहले सासाराम की सभा में उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार की अगुआई में सरकार बनाना जरूरी है. वहीं, अब के भाषण में उन्होंने नीतीश की अगुआई में एनडीए चुनाव लड़ रहा है तो कहा, मगर यह नहीं बताया कि चुनाव के बाद नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे. यह वही अनकहा सच है, जिसे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व चाहे वह प्रधानमंत्री मोदी हों या गृह मंत्री अमित शाह,दोनों ने अब तक टाल रखा है. वे नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात करते हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर उनके नाम की गारंटी नहीं देते.
यह अस्पष्टता दरअसल भाजपा की डबल एजेंडा पॉलिटिक्स का हिस्सा है. एक तरफ वह नीतीश के साथ गठबंधन बनाए रखकर जनता के सामने स्थिरता का संदेश देना चाहती है, दूसरी तरफ वह चुनाव बाद की स्थिति में अपने लिए खुला रास्ता भी छोड़ रही है. 2020 में भाजपा ने जब-जब नीतीश के नेतृत्व को खुलकर आगे किया, तब जनता के बीच यह साफ संदेश गया कि मुख्यमंत्री वही होंगे. लेकिन इस बार भाजपा उस संदेश को दोहराने से बच रही है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या भाजपा नीतीश कुमार के बाद की तैयारी में है? राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि भाजपा अब बिहार में अपनी अधीन साझेदार की भूमिका से बाहर निकलना चाहती है. बिहार हिंदी पट्टी का इकलौता ऐसा राज्य है, जहां भाजपा कभी मुख्यमंत्री नहीं रही. पिछले दो दशकों में उसने सत्ता का स्वाद तो चखा, लेकिन नेतृत्व नहीं पाया.
बिहार की राजनीति हमेशा से तीन सिरों पर टिकी रही है,नीतीश कुमार की जदयू, लालू यादव की राजद और भाजपा. सत्ता इन्हीं तीनों में से दो के मिल जाने से बनती रही है. भाजपा 2015 में यह प्रयोग कर चुकी है. उसने जदयू से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ा और बुरी तरह हार गई. तब लालू और नीतीश एक साथ थे, और भाजपा विपक्ष में चली गई. 2020 में भाजपा ने जदयू के साथ गठबंधन किया, लेकिन सीटों का समीकरण ऐसा था कि भाजपा ने जदयू से ज्यादा सीटें जीतकर वरिष्ठ साझेदार का दर्जा तो पा लिया, पर मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर भी नीतीश के पास रही.
इस बार परिदृश्य अलग है. नीतीश कुमार अब उस स्थिति में नहीं हैं, जब उनके नाम से चुनाव जीता जा सके. उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक पकड़ पहले जैसी नहीं रही. जदयू की संगठनात्मक ताकत भी सीमित है. दूसरी ओर भाजपा अपनी जमीन लगातार मजबूत कर रही है. ऐसे में मोदी और शाह दोनों की यह रणनीति समझी जा सकती है कि वे नीतीश के नेतृत्व की बात करें, लेकिन सरकार के चेहरे की नहीं. प्रधानमंत्री के भाषण में नीतीश के नाम का जिक्र तो सम्मानपूर्वक हुआ, मगर उसके पीछे की राजनीतिक दूरी साफ दिखी. भाजपा के लिए नीतीश इस वक्त एक आवश्यक सहयोगी हैं, लेकिन अपरिहार्य नहीं. 2025 के चुनाव के बाद अगर भाजपा को पूर्ण बहुमत या उसके आस-पास का आंकड़ा मिलता है, तो सत्ता की तस्वीर बदलना तय है. यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा का मौजूदा अभियान नीतीश कुमार के साथ मिलकर जीतने और चुनाव के बाद शायद आगे बढ़ने दोनों की तैयारी है. भले ही मंच से अब भी कहा जा रहा है,नीतीश के नेतृत्व में एनडीए चुनाव लड़ रहा है, लेकिन भीतरी राजनीति में अब सवाल यह नहीं है कि नीतीश नेतृत्व कर रहे हैं या नहीं, बल्कि यह है कि कब तक करेंगे.