नई दिल्ली। भारतीय इतिहास में जब भी शौर्य, पराक्रम और वीरता की गाथाओं का जिक्र होता है, तो मराठा साम्राज्य का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है. इस साम्राज्य की नींव छत्रपति शिवाजी महाराज ने रखी थी, जिन्होंने मुगल शासकों के खिलाफ डटकर सामना किया और हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की. लेकिन उनके बाद भी यह संघर्ष रुका नहीं. उनके पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज(Sambhaji Maharaj) ने उनकी विरासत को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि अपने पराक्रम से मुगल सम्राट औरंगजेब तक को हिला कर रख दिया.
विक्की कौशल अभिनीत आगामी फिल्म ‘छावा’ में इसी वीर योद्धा की गौरवगाथा को जीवंत किया जा रहा है. यह फिल्म उन वीर गाथाओं को पर्दे पर लाएगी, जिन्होंने भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़े हैं.
Sambhaji Maharaj : 120 युद्ध लड़े और जीते
छत्रपति शिवाजी महाराज के बड़े पुत्र संभाजी महाराज का जीवन वीरता और संघर्ष की मिसाल था. 22 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला युद्ध लड़ा और 32 वर्ष की आयु तक वे 120 युद्ध लड़ चुके थे, जिनमें से वे सभी में विजयी रहे. उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी, यहां तक कि मुगल शासक औरंगजेब भी उन्हें परास्त नहीं कर सका. मराठाओं की शक्ति को खत्म करने का सपना देखने वाला औरंगजेब कभी इस महान योद्धा को युद्ध में हरा नहीं पाया.
कैसे पड़ा था नाम ‘छावा’?
संभाजी महाराज को ‘छावा’ कहे जाने के पीछे एक भावनात्मक पहलू जुड़ा हुआ है. मराठी में ‘छावा’ का अर्थ होता है ‘शेर का बच्चा’ या ‘साहसी योद्धा’. शिवाजी महाराज अपने बेटे को इसी नाम से पुकारते थे, जो उनके साहस और वीरता का प्रतीक बन गया. इस उपाधि के पीछे कोई विशेष ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह शिवाजी महाराज के स्नेह और गर्व का प्रतीक थी.
औरंगजेब भी था संभाजी महाराज का कायल
संभाजी महाराज (Sambhaji Maharaj) ने औरंगजेब के खिलाफ कई युद्ध लड़े और मुगल शासक को कई बार परास्त किया. वे केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी रणनीतिकार भी थे, जिन्होंने मराठा साम्राज्य की रक्षा के लिए कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी. हालांकि, अंततः विश्वासघात के कारण वे मुगलों के हाथों कैद हो गए. उनके ही कुछ विश्वासपात्रों ने उनके साथ धोखा किया और उन्हें औरंगजेब के सैनिकों को सौंप दिया.
Sambhaji Maharaj पर हुए क्रूरतम अत्याचार
संभाजी महाराज को पकड़ने के बाद औरंगजेब ने उन पर अमानवीय अत्याचार किए. कहा जाता है कि उनकी आंखें निकाल ली गईं, उनके शरीर के टुकड़े कर दिए गए और अंततः उन्हें क्रूरतापूर्वक मार दिया गया. इसके बावजूद उन्होंने कभी औरंगजेब के सामने घुटने नहीं टेके और हिंदू धर्म व मराठा स्वराज्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी. उनकी शहादत से मराठा साम्राज्य को गहरा आघात लगा, लेकिन उनकी वीरगाथा इतिहास में अमर हो गई.
औरंगजेब को हुआ था पछतावा
इतिहासकारों के अनुसार, संभाजी महाराज की मौत के बाद औरंगजेब को इसका पछतावा हुआ था. उसने स्वीकार किया था कि काश, उसके पास भी संभाजी जैसा बेटा होता. यह कथन इस बात का प्रमाण है कि संभाजी महाराज की वीरता और चरित्र ने उनके शत्रुओं तक को प्रभावित किया था.
संभाजी महाराज का योगदान और विरासत
संभाजी महाराज (Sambhaji Maharaj) ने केवल युद्ध में ही नहीं, बल्कि प्रशासन में भी उत्कृष्ट कार्य किए. वे एक विद्वान शासक थे और कई भाषाओं में निपुण थे. उनके कार्यों ने मराठा साम्राज्य को मजबूती दी और उनके बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया. उनकी कहानी केवल मराठाओं की नहीं, बल्कि पूरे भारत की शौर्यगाथा है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता. ‘छावा’ फिल्म के माध्यम से संभाजी महाराज की वीरगाथा को एक बार फिर जीवंत किया जाएगा, जिससे नई पीढ़ी को उनकी बलिदानी गाथा से प्रेरणा मिलेगी.