Anti rape laws: भारत में बलात्कार विरोधी कानून ( anti rape laws) समय के साथ विकसित हुए हैं जो यौन हिंसा के पीड़ितों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करने और consent को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए कानूनी सुधारों को दर्शाता है. भारत में बलात्कार विरोधी कानून का इतिहास एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा का परिणाम है, यह यात्रा न केवल सामाजिक दृष्टिकोण के बदलाव को दर्शाती है बल्कि न्यायपालिका विधायिका और महिला अधिकार आंदोलन की निरंतर लड़ाई को भी प्रतिबिंबित करती है…
कानूनी विकास का ऐतिहास
भारतीय बलात्कार कानून की जड़े औपनिवेशिक भारतीय दंड संहिता, 1860 में है, जहां बलात्कार मुख्य रूप से एक महिला की शारीरिक स्वायत्तता(autonomy) ke बजाए पुरुषों की संपति का उल्लंघन माना जाता था.
1972 का मथुरा रेप केस जहां से परिवर्तन की शुरुआत हुई, मथुरा नाम की एक आदिवासी लड़की के साथ महाराष्ट्र के एक पुलिस स्टेशन में कथित रूप से दो पुलिसकर्मियों ने बलात्कार किया, 1979 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अभियुक्त को यह कहते हुए बरी कर दिया की लड़की के शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं थे इसीलिए माना जाता है कि उसने सहमति दी थी. यह तर्क महिलाओं की अधिकार कार्यकर्ताओं और समाज के बड़े हिस्से को गहरा आहत कर गया, निर्णय में यह मान लिया गया कि यदि शारीरिक चोट नहीं है तो वह सहमति से संबंध है जो की एक बेहद समस्या ग्रस्त सोच थी खासकर तब जब मामला कस्टोडियल रेप का हो. इस निर्णय ने पूरे देश में महिला आंदोलन को प्रचलित किया हजारों महिलाओं ने अदालत और संसद के बाहर प्रदर्शन किया और परिणाम स्वरुप पहली बार बलात्कार कानून में बड़े सुधार की मांग उठाई गई.
1983 में पहला बड़ा कानून
लोगों के दबाव के कारण संसद ने 1983 में भारतीय दंड संहिता (IPC) और साक्ष्य अधिनियम ( Evidence Act) में महत्वपूर्ण बदलाव किए जैसे–
कस्टोडियल रेप के लिए कठोर दंड, किसी भी पुलिस हिरासत जेल अस्पताल या सरकारी संरक्षण गृह में होने वाले बलात्कार को विशेष रूप से गंभीर अपराध माना जाएगा ऐसे मामलों में प्रमाण का भार ( burden of proof) काफी हद तक आरोपी पर स्थानांतरित कर दिया गया. आरोपी पक्ष द्वारा पीड़िता के चरित्र या पूर्व यौन व्यवहार (prior sexual behavior) को अदालत में तर्क के रूप में इस्तेमाल करने पर रोक लगाई गई. हाईमेन का टूटा होना, दर्द का ना होना या चोटों का ना होना बलात्कार न होने का प्रमाण नहीं माना जाएगा. इन सुधारो ने पहली बार बलात्कार को एक व्यक्ति की गरिमा पर हमला किया मना, न की मात्रा शारीरिक हिंसा का प्रश्न.
2012 निर्भया कांड
16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ हुआ क्रूरतम सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को झकझोर के रख दिया युवाओं महिलाओं और नागरिक समाज के बड़े वर्ग ने सड़कों पर उतरकर सरकार और संसद को मजबूर कर दिया कि वह कानून में अमूलचूल (radically) परिवर्तन करें. अधिनियम 2013 निर्भय सामूहिक बलात्कार मामले के बाद सार्वजनिक मांग पर ले गए यह सबसे व्यापक सुधारो में से एक था किसने बलात्कार की परिभाषा का विस्तार किया सजाएं सख्त की गई. पीड़िता के पिछले यो इतिहास को साक्षी के रूप में इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी गई बलात्कार का पता लगाने के लिए टू फिंगर टेस्ट को समाप्त कर दिया गया क्योंकि इस चिकित्सीय के रूप से आप्रासंगिक माना गया. सहमति (consent) की कानूनी परिभाषा को स्पष्ट किया गया, पुलिस और सशस्त्र बलों की जवाब दे ही तय करने की सिफारिश की गई, वैवाहिक बलात्कार (marital rape) को अपराध घोषित करने की अनुशंसा की. यौन उत्पीड़न पीछा करना (Stalking) एसिड अटैक जैसे अपराधों को अलग श्रेणियां में डालने का सुझाव दिया गया. 16 वर्ष से कम आयु की सहमति अमान्य की गई, पीड़िता की गवाही को केंद्रीय महत्व दिया गया, फास्ट्रेक अदालतों की स्थापना की गई, इसके बाद भारत के कानून पहली बार व्यापक आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब माने जाने लगा.
POCSO और अन्य सुधार
POCSO( protection of children from sexual offences Act) को और मजबूत किया गया जिसमें बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए कड़ी सजा तय की गई, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63( बलात्कार) को गैर सहमति से किए गए यौन कृतियों के रूप में परिभाषित करती है, इसमें शारीरिक बल, धमकी, जबरदस्ती छल या अधिकार के दुरुपयोग द्वारा प्राप्त यौन संपर्क शामिल है, आजीवन कारावास या कुछ जघन्य मामलों में मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान किया गया. इसके अलावा बलात्कार मामलों में तेज जांच (2 महीने) के अंदर त्वरित न्याय डीएनए प्रोफाइलिंग जैसे वैज्ञानिक प्रमाणों पर जोर दिया यह कदम पीड़िता केंद्रित न्याय प्रणाली बनाने की दिशा में महत्व रखते हैं. वही CJI बी गवाई द्वारा हाल ही में 1979 के निर्णय की आलोचना यह दर्शाती है कि न्यायपालिका स्वयं स्वीकार कर रही है की चोट का ना होना सहमति का प्रमाण नहीं है बलात्कार केवल शरीर पर नहीं बल्कि मन गरिमा और स्वायत्तता(autonomy) पर हमला है.
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
कानूनी सुधार के बावजूद भारत के बलात्कार विरोधी कानून में कई महत्वपूर्ण चुनौतियां (Challenges)अभी भी बनी हुई है. अदालत में मुकदमों का बैकलॉग और फास्ट्रेक अदालतों (fast track courts) के असमान संचालन के कारण न्याय मिलने में लंबा समय लगता है जिससे पीड़ितो को दोहरा आघात (revictimization) पहुंचता है. यौन हिंसा से जुड़ा गहरा सामाजिक कलंक (social stigma) और पीड़ितों को दोष देने की प्रवत्ति कई बचे हुए लोगों को अपराध की रिपोर्ट करने से रोकती हैं. भारत में आघात परामर्श (trauma counselling), आर्थिक सहायता और संरक्षण सेवाओं सहित समन्वित समग्र समर्थन सेवाओं( holistic support services) की कमी हैं. वैवाहिक बलात्कार (martial rape) को अभी भी भारत में अपराध नहीं माना जाता है, जबकि कई अन्य देशों में इसे अपराध माना जाता हैं.
भारत में बलात्कार विरोधी कानून में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है लेकिन प्रभावी कार्यान्वयन (execution) और सामाजिक मानसिकता को बदलना अभी भी बड़ी चुनौती है. भारत में यौन हिंसा से लड़ने के लिए कानूनी सुधारो को सामाजिक पहलू और मजबूत प्रवर्तन के साथ जोड़ना महत्वपूर्ण है ताकि बचे हुए लोगों को समय पर निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से न्याय मिल सके.