Bihar politics : बिहार की राजनीति में इन दिनों अलग-अलग दलों की सक्रियता और रणनीतियों पर खूब चर्चा हो रही है. लेकिन एक तरफ जहां विपक्ष ने अपत्क्ष तौर पर सरकार के खिलाफ मौन साध ली है वहीं दूसरी तरफ राज्य में कांग्रेस (Congress) की स्थिति को लेकर भी सन्नाटा छाया हुआ है.विधानसभा चुनाव परिणाम आए लगभग तीन महीने बीत चुके हैं, फिर भी कांग्रेस अपने छह विजयी विधायकों में से विधायक दल का नेता नहीं चुन पाई है.
तीन महीने बाद भी नेता का चयन नहीं
सूत्रों के मुताबिक पटना से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे पर बैठकों का दौर चला. दिल्ली में पार्टी नेतृत्व स्तर पर भी विचार-विमर्श हुआ, जिसमें वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया. हालांकि आधिकारिक तौर पर सब कुछ सामान्य बताया गया, लेकिन अंदरखाने मतभेद की चर्चाएं भी सामने आईं. इसके बावजूद अब तक विधायक दल का नेता तय नहीं हो सका है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को अपने ही विधायकों के असंतोष का डर सता रहा है. यदि छह में से किसी एक को नेता बनाया जाता है, तो शेष पांच की नाराजगी पार्टी के लिए संकट खड़ा कर सकती है. पहले जो वरिष्ठ नेता विधायक दल का नेतृत्व करते थे, वे इस बार चुनाव हार गए हैं. ऐसे में पार्टी को नए चेहरे पर दांव लगाना पड़ रहा है.
टूट की आशंका और रणनीतिक चुप्पी
महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस की स्थिति कमजोर दिख रही है. चर्चा यह भी रही कि बजट सत्र के दौरान कांग्रेस के कुछ विधायक पाला बदल सकते हैं. अटकलें थीं कि वे सत्तारूढ़ दल में शामिल हो सकते हैं, जिससे कांग्रेस को बड़ा झटका लग सकता था. हालांकि फिलहाल ऐसी संभावनाओं पर विराम लगा हुआ है. जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने जानबूझकर नेता का चयन टाल दिया ताकि किसी संभावित नाराजगी से बचा जा सके. यदि सत्र के दौरान टूट होती, तो इसका संदेश राज्य ही नहीं, केंद्र की राजनीति पर भी असर डालता.
सत्तापक्ष की भी सीमाएं
दूसरी ओर, यह भी चर्चा रही कि अगर कांग्रेस के विधायक दल बदलते हैं तो उन्हें क्या मिलेगा. मंत्री पद या अन्य राजनीतिक समायोजन जैसे सवाल सामने आए. लेकिन सत्तारूढ़ दल के भीतर पहले से ही कई दावेदार मौजूद हैं, ऐसे में नए विधायकों को समायोजित करना आसान नहीं है. यही कारण है कि संभावित राजनीतिक समीकरण साकार नहीं हो पाए.
नए नेतृत्व की चुनौती
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे नेता का चयन करना है जो न केवल जातीय और सामाजिक समीकरण साध सके, बल्कि विधानसभा में प्रभावी ढंग से विपक्ष की भूमिका निभा सके. राज्य की विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन को भारी बहुमत प्राप्त है, ऐसे में एक मजबूत और मुखर नेता की आवश्यकता है. सूत्रों के अनुसार जल्द ही पार्टी के प्रदेश नेतृत्व और केंद्रीय पर्यवेक्षक की बैठक पटना में होने वाली है. इसमें संभावित नामों पर चर्चा की जाएगी और विधायक दल का नेता चुने जाने की संभावना है. फिलहाल बिहार में कांग्रेस की चुप्पी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी कब अपने विधायक दल के नेता की घोषणा करती है और राज्य की राजनीति में अपनी भूमिका को कैसे परिभाषित करती है.