Welfare Politics : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का वो भाषण तो आपको याद ही होगा जिसमें वो सरकार द्वारा मिलने वाले फ्रीबीज का विरोध करते हैं. लेकिन राजनीति का खेल देखिए वहीं नीतीश कुमार जब एक बार फिर से सत्ता में वापसी कर किए है तो फ्रीबीज की बैसाखी के दम पर ही. हालांकि नीतीश ना तो अकेले राजनेता है जिन्होंने सत्ता की कुर्सी के लिए इस बैसाखी का इस्तेमाल किया है और ना ही यह पहली बार हुआ है. अब आंकड़े देखें तो कई रिपोर्टों के मुताबिक फ्रीबीज के कारण राज्यों का कुल बकाया देयता (outstanding liabilities) ₹83.32 ट्रिलियन तक का है. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2025 तक राज्यों का कुल कर्ज़ लगभग 27.5% के बराबर है.
कितना सही है फ्रीबीज देकर चुनाव जीतने वाली स्कीम
अब देखें तो भारत की राजनीति में फ्रीबीज़ यानी मुफ्त मिलने वाली सरकारी सुविधाएं हमेशा चर्चा में रहती हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या फ्रीबीज देकर चुनाव जीतने वाला यह स्कीम कितना सही है. बिहार चुनाव से पहले नीतीश कुमार की सरकार ने कई विशेष योजनाएं लॉन्च की, जिसका सीधा फायदा अलग-अलग समूहों को मिला. इनमें महिला उद्यमियों को ₹10,000 की सहायता, 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली, पेंशन में बढ़ोतरी और युवाओं को मासिक भत्ता शामिल है. खास वर्गों को ध्यान में रखकर बनाई गईं ये योजनाओं को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे टारगेटेड बेनिफिट्स नेताओं और वोटरों के बीच मजबूत रिश्ता बनाते हैं, जिसे चुनाव में लाभ मिलता है. लेकिन रिपोर्ट बताती है कि मुफ्त सुविधाएं वोट दिलाने में असरदार होती हैं, पर इससे स्कूल, अस्पताल, सड़क जैसी सार्वजनिक सेवाओं का विकास नहीं होता. सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के लिए समय और लंबी योजना चाहिए, जबकि फ्रीबीज़ का फायदा तुरंत दिखता है, इसी कारण पार्टियां इसे ज्यादा प्राथमिकता देती हैं. इसके साथ साथ यह राज्य के आर्थीक विकास को भी वाधित करता हैं.
एक तरफ देखें तो बिहार जैसे गरीब राज्यों में फ्रीबीज़ का असर ज्यादा पड़ता है क्योंकि लोगों की बुनियादी ज़रूरतें अभी भी बहुत हैं. लेकिन अगर सरकारें सिर्फ मुफ्त सुविधाओं पर टिक जाएं, तो बजट पर दबाव बढ़ सकता है, लंबे समय में स्कूल, अस्पताल और इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर पड़ सकते हैं. जो किसी राज्य के विकास के लिए अवरोधक हैं. हालांकि नीतीश कुमार की लंबे समय से बनी छवि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, गरीबी में कमी, शासन की स्थिरता ने भी उनके पक्ष में काम किया लेकिन 2025 के चुनाव में उन्हें भी फ्रीबीज की सहायता लेनी पड़ी.
फ्रीबीज पर कितना खर्च हो रहा है?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार साल 2023–24 में ही राज्यों ने सब्सिडी पर 3.18 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. वित्तीय दस्तावेज़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि प्रमुख 24 राज्यों ने अकेले 2023–24 में विभिन्न सब्सिडी और फ्रीबीज़ पर ₹3.18 लाख करोड़ खर्च किए. Emkay Global Financial Services के अनुसार, 2024–25 में यह राशि ₹3.7 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है जो अब तक का सबसे बड़ा सब्सिडी व्यय होगा. इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ 10 राज्यों की चुनावी और लोकलुभावन योजनाओं का अनुमानित खर्च ही ₹1.5 ट्रिलियन से ज्यादा है.
फ्रीबीज से बिहार को कितना नुकसान
मुफ्त सुविधाओं की बढ़ती होड़ का असर अर्थव्यवस्था पर साफ नजर आता है. हालांकि कई राज्य पहले से ही बढ़ते राजकोषीय घाटे से जूझ रहे हैं, लेकिन चुनाव 2025 के बाद बिहार की स्थिति इससे कहीं ज्यादा चिंताजनक है. आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार का राजकोषीय घाटा 2024-25 में बजट में अनुमानित 3% के मुकाबले संशोधित आंकड़ों में बढ़कर जीएसडीपी के 9.2% तक पहुंच गया. हालांकि, अंतिम अनुमानों में यह कुछ कम होकर करीब 6% पर आ गया, लेकिन यह स्तर भी किसी राज्य के लिए बेहद गंभीर माना जाता है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि फ्रीबीज पर होने वाला खर्च बिहार के वार्षिक पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) से भी अधिक हो गया है. वित्त वर्ष 2026 के लिए अनुमानित आंकड़े बताते हैं कि मुफ्त सुविधाओं का अनुमानित खर्च 41,200 करोड़ रुपये है लेकिन बिहार का पूंजीगत व्यय बजट महज 40,532 करोड़ रुपये है.इसका मतलब है कि राज्य अब विकास योजनाओं से ज्यादा पैसा मुफ्त योजनाओं पर खर्च कर रहा है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि राजकोषीय घाटे की 3% की सीमा राज्यों के लिए अब बेहद कम होती जा रही है, क्योंकि फ्रीबीज अब राज्य सरकार के बजट का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं. विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो इससे न केवल बिहार की वित्तीय स्थिति कमजोर होगी, बल्कि भविष्य की विकास क्षमता पर भी गंभीर असर पड़ेगा.