Bihar Politics: बिहार की राजनीति में महागठबंधन के भीतर मुख्यमंत्री पद का सवाल अब सिर्फ औपचारिक बहस नहीं रह गया है राजद नेता तेजस्वी यादव ने बार-बार स्वयं को गठबंधन का चेहरा घोषित कर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है.वहीं कांग्रेस लगातार चुप्पी साधे हुए है । यह चुप्पी महज औपचारिकता नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है.
तेजस्वी यादव की राजनीतिक ताकत निर्विवाद रूप से यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर आधारित है । यह समीकरण राजद को मजबूत बनाता है, परंतु कांग्रेस के लिए पर्याप्त नहीं है. कांग्रेस की नजर उन जाति समूहों पर है जो अब तक एनडीए के पाले में रहे हैं,विशेषकर सवर्ण और अनुसूचित जाति के वोटर. तेजस्वी को पहले ही आगे करने से कांग्रेस को आशंका है कि ये वर्ग इसे और अधिक दूरी बना सकते हैं। यही कारण है कि वह अंतिम समय तक मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर अस्पष्ट रुख बनाए रखना चाहती है।
जैसा की लोकसभा चुनाव से देखा जा रहा कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति को आक्रामक रूप से साधने की कोशिश की है । कांग्रेस को अंदेशा है कि यदि बिहार में वही प्रयोग दोहराया गया और अल्पसंख्यकों व दलितों का ध्रुवीकरण एक ही दल की ओर हो गया, तो उसकी राजनीतिक जमीन और संकुचित हो जाएगी । 1989 के भागलपुर दंगे के बाद से कांग्रेस इन दोनों समुदायों से दूरी महसूस कर रही है और अब उस खोए हुए आधार को वापस पाने की कोशिश में है ।
महागठबंधन की राजनीति में राजद की स्थिति अपेक्षाकृत बड़ी है और इसी आधार पर वह कांग्रेस को पिछलग्गू बनाए रखना चाहता है । लेकिन राहुल गांधी का दृष्टिकोण अलग है. उनकी प्राथमिकता लोकसभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर संतुलन साधना है । यदि कांग्रेस अभी तेजस्वी का नाम घोषित कर देती है तो बिहार में राजद का दबदबा और मजबूत होगा. कांग्रेस इसे टालना चाहती है ताकि सत्ता-साझेदारी का अंतिम निर्णय चुनाव के बाद हो.वास्तविक तनाव सीट बंटवारे को लेकर है । राजद को संदेह है कि मुख्यमंत्री चेहरे को लंबित रखकर कांग्रेस वार्ता में बढ़त लेना चाहती है. वहीं कांग्रेस को डर है कि यदि उसने अभी से तेजस्वी को मान्यता दे दी तो बातचीत में उसकी स्थिति कमजोर हो जाएगी और वह अपेक्षित सीटें नहीं निकाल पाएगी ।
पिछले कुछ वर्षों में एनडीए ने सवर्ण और गैर-यादव पिछड़े वर्ग के वोटरों पर पकड़ मजबूत बनाई है । कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति के जरिए उन्हें वापस खींचने की कोशिश कर रही है.ऐसे में तेजस्वी को आगे कर देना उसके इस प्रयास को बाधित कर सकता है. यही वजह है कि कांग्रेस जानबूझकर स्थिति को धुंधली रख रही है.
राजद की अकुलाहट और कांग्रेस की सावधानी,दोनों ही बिहार की राजनीति के भविष्य को परिभाषित कर रहे हैं । महागठबंधन का असली इम्तहान सिर्फ सीट बंटवारे में नहीं,बल्कि यह तय करने में है कि सत्ता की दौड़ में कौन-सा दल नेतृत्व की छवि गढ़ता है । तेजस्वी के उत्साह और कांग्रेस की रणनीतिक चुप्पी के बीच यह साफ है कि फिलहाल महागठबंधन में चेहरे की राजनीति चुनाव बाद तक टलती रहेगी ।