Saharabbandi News : बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है. साल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री Nitish Kumar द्वारा लागू की गई पूर्ण शराबबंदी नीति अब समीक्षा के दायरे में दिखाई दे रही है.मीडिया सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार शराबबंदी को अचानक समाप्त करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से इसमें ढील देने की योजना पर विचार कर रही है. हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन सरकार के भीतर इस मुद्दे पर गहन मंथन जारी है.
राजस्व और आर्थिक दबाव मुख्य कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी हटाने पर विचार के पीछे प्रमुख कारण राज्य का राजस्व संकट है. शराबबंदी लागू होने से पहले बिहार को उत्पाद शुल्क से लगभग 3000–3500 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था, जो उस समय कुल बजट का 12–15% तक था. वर्तमान में राज्य का बजट काफी बढ़ चुका है, ऐसे में संभावित राजस्व हानि और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. बताया जा रहा है कि अगर शराबबंदी में ढील दी जाती है, तो राज्य को 25,000 से 30,000 करोड़ रुपये तक का राजस्व मिल सकता है.
कानून के प्रभाव पर सवाल
शराबबंदी लागू होने के बाद पिछले 10 वर्षों में लगभग 16 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया और करोड़ों लीटर शराब जब्त कर नष्ट की गई. इसके बावजूद राज्य में अवैध शराब की आपूर्ति और खपत पूरी तरह नहीं रुक सकी है. स्वास्थ्य लाभ के दावों को लेकर भी अब अध्ययन की मांग उठ रही है, विशेष रूप से यह जानने के लिए कि शराबबंदी से पहले और बाद में लीवर संबंधी बीमारियों में कितना बदलाव आया.
संभावित चरणबद्ध योजना
मीडिया सूत्रों के अनुसार यदि शराबबंदी में ढील दी जाती है, तो इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है. शुरुआती चरण में केवल पांच सितारा होटलों में विदेशी पर्यटकों को शराब परोसने की अनुमति दी जा सकती है. इसके लिए पासपोर्ट जैसी पहचान अनिवार्य हो सकती है. फिर बाद के चरणों में अन्य श्रेणियों के लोगों के लिए भी नियमों में ढील दी जा सकती है. यह मॉडल कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से प्रेरित बताया जा रहा है, जहां स्थानीय नागरिकों और विदेशी पर्यटकों के लिए अलग-अलग नियम लागू होते हैं.
राजनीतिक सहमति जरूरी
हालांकि वर्तमान सरकार में नेतृत्व की भूमिका बदलने के बावजूद Nitish Kumar की राय इस मुद्दे पर निर्णायक मानी जा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शराबबंदी हटाने या उसमें बदलाव के लिए व्यापक सहमति बनाना आवश्यक होगा, खासकर महिला मतदाताओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए. फिलहाल सरकार की ओर से कोई औपचारिक नीति घोषित नहीं की गई है. लेकिन जिस तरह से चर्चाएं तेज हुई हैं, उससे संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सकता है.