India GDP growth : मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात ने ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है, जिसका असर तेल की कीमतों और आयात खर्च पर साफ दिखाई दे रहा है. मौजूदा वैश्विक परिस्थिति ऐसी है कि भारत समेत दुनिया के कई देश आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं. भारत जैसे देश के लिए यह संकट अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा और दूसरे अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं.
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल के संबोधनों में आर्थिक सतर्कता की आवश्यकता पर जोर देते हुए आम लोगों से आयातित वस्तुओं के उपयोग में कमी लाने की अपील की. उन्होंने विशेष रूप से पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने, सोने की खरीद सीमित करने और अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने की सलाह दी, ताकि देश का विदेशी मुद्रा भंडार संतुलित बना रहे और संभावित आर्थिक संकट से निपटने की क्षमता मजबूत हो सके. बार बार पीएम के भाषण में स्थिति को लेकर जो आशंका जताई जा रही उसको लेकर आम लोगों में आर्थिक भय जैसा माहौल भी देखने को मिल रहा. हालांकि प्रधानमंत्री के इस अपील का सकारात्मक पहलू ये है कि लोग सतर्क हो रहे हैं. लोगों की सतर्कता का अंदाजा मार्केट की स्थिति से लगाया जा सकता हैं. इसके इतर जानकार और विशेषज्ञ भी अलग अलग दावे कर रहे हैं
प्रधानमंत्री की अपील के बाद कई राज्यों में सरकार द्वारा प्रतीकात्मक कदम उठाए गए. बिहार, मध्य प्रदेश और अन्य दूसरे राज्यों में सरकारी स्तर पर ईंधन बचत को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए. प्रतीक के तौर पर प्रधानमंत्री के काफिले में वाहनों की संख्या कम दिखाई दी. कई मंत्री और जनप्रतिनिधि साइकिल, मोटरसाइकिल, रिक्शा और सार्वजनिक वाहनों से कार्यालय जाते नजर आए. बिहार में मुख्यमंत्री Samrat Choudhary के पैदल दफ्तर जाने की तस्वीरें और दूसरे मंत्रियों के ट्रेन से सफर करने के वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुए. राजस्थान की राजधानी जयपुर में पुलिस विभाग ने भी ईंधन बचत अभियान के तहत साइकिल से गश्त शुरू की. संभावित ऊर्जा और आर्थिक संकट को लेकर सरकार द्वारा उठाए इन कदमों की एक तरफ जहां सराहना की जा रही है वहीं दूसरी तरफ इन अभियानों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि यह प्रयास पीआर स्टंट या फोटो-ऑप तक के लिए हैं.
उनका दावा है कि कई मौकों पर नेताओं के साइकिल चलाने, मोटरसाइकिल, रिक्शा और सार्वजनिक वाहनों का उपयोग के समय सुरक्षा वाहनों और कैमरा टीमों का बड़ा काफिला होता है, जिससे वास्तविक ईंधन बचत महज एक दिखावा लगता है.आलोचकों के दावों को बल इसलिए मिल रहा क्योंकि नेताओं द्वारा उठाए गए ये कदम उतनी ही देर के लिए होती है जब तक की मीडिया और कैमरे की मौजूदगी रहती है. विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल में व्यापक कटौती करना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं है. ऐसे में केवल प्रतीकात्मक तौर पर छोटे काफिले या साइकिल यात्रा दिखाने से कुल सरकारी ईंधन खपत में बड़ा बदलाव नहीं आता.
वहीं आर्थिक जानकारों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और आयात बिल घटाने के लिए दीर्घकालिक नीतिगत सुधार अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं. इनमें बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने वाली नीतियां, ईंधन करों का तार्किक पुनर्गठन, सरकारी वाहनों के अनावश्यक उपयोग पर नियंत्रण तथा स्थायी वर्क-फ्रॉम-होम व्यवस्था जैसे कदम शामिल होने चाहिए. विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले प्रतीकात्मक अभियान जन जागरूकता पैदा करने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन केवल तस्वीरों और वीडियो के आधार पर आर्थिक चुनौतियों का समाधान संभव नहीं है. वास्तविक बदलाव के लिए नीति, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक स्तर पर ठोस और दीर्घकालिक सुधार आवश्यक होंगे.