क्या है कर्नाटक सरकार का नया हेट स्पीच बिल…? नए कानून पर विशेषज्ञ क्यों जता रहे चिंता

Hate Speech law : कर्नाटक सरकार ने देश में पहली बार अलग से एक व्यापक हेट स्पीच और हेट क्राइम रोकथाम कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. बुधवार को राज्य कैबिनेट ने कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025 को मंजूरी दी है. इस बिल का उद्देश्य नफरती भाषण, सामाजिक तनाव फैलाने वाली गतिविधियों और संगठित रूप से फैलाई जाने वाली घृणा को कानूनी रूप से रोकना है. यह बिल अब आने वाले विधानसभा सत्र में पेश होगा.

क्यों लाया गया है बिल ?

भारत में अभी हेट स्पीच से जुड़ी धारा BNS (पहले IPC) की कुछ सामान्य धाराओं के तहत ही कार्रवाई होती है, जिनका उद्देश्य पब्लिक ऑर्डर बनाए रखना है. विशेषज्ञों के मुताबिक, ये धाराएं सीमित हैं और डिजिटल युग में फैल रही नफरत को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं. कर्नाटक सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया पर नफरती कंटेंट तेज़ी से फैल रहा है,जाति, धर्म, भाषा और जेंडर के आधार पर हमलों के मामले बढ़े हैं इस वजह से एक सीधा, स्पष्ट और कठोर कानून जरूरी है

बिल के अनुसार क्या होगी हेट स्पीच की परिभाषा

बिल में हेट स्पीच का मतलब है कि कोई भी बोलकर, लिखकर, पोस्ट या शेयर करके कही/फैलायी गई बात, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समूह के खिलाफ घृणा, दुश्मनी, भेदभाव, हिंसा या तनाव फैलाना हो या घृणा धर्म, जाति, समुदाय, भाषा, लिंग, यौन रुझान, दिव्यांगता, मूल स्थान जैसी पहचान पर आधारित नफरत फैलाना हेट स्पीच मानी जाएगी. इसे ऑफलाइन भाषण, सोशल मीडिया, वीडियो, पोस्ट, फॉरवर्ड सब पर लागू किया गया है.

बिल के अनुसार किसे माना जाएगा हेट क्राइम ?

हेट स्पीच से प्रेरित अपराध, किसी समुदाय/समूह के खिलाफ जानबूझकर की गई हिंसा और नफरत या भेदभाव से प्रेरित हमला, धमकी, उकसावा तथा नफकरी गतिविधियों में शामिल होने या उन्हें बढ़ावा देने की कोशिश कानून की नजर में हेट क्राइम मानी जाएगी.

हेट स्पीच या क्राइम के लिए क्या मिलेगी सजा?

कानून के अनुसार अगर कोई यह अपराध करता है तो उसके लिए दो तरह के सजा का प्रावधान किया गया है. जिसमें पहली बार अपराध के लिए 1 से 7 साल जेल और ₹50,000 तक जुर्माना लेकिन अगर आरोपी बार-बार अपराध करता है तो उसे 2 से 10 साल जेल और ₹1 लाख तक जुर्माना वसूला जाएगा. बिल में इन मामलों को संज्ञेय (cognisable) और ग़ैर-जमानती (non-bailable) बनाया गया है. मामलों की सुनवाई ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास करेंगे.

डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया भी दायरे में

बिल में यह भी व्यवस्था है कि सरकार या कोर्ट आपत्तिजनक ऑनलाइन कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने का आदेश दे सकते हैं. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (फेसबुक, X, यूट्यूब आदि) और एडमिन भी ज़िम्मेदार बनाए जा सकते हैं अगर वे ऐसे कंटेंट को रोकने में लापरवाही करें. इसके साथ साथ यदि कोई संगठन, संस्था या समूह हेट स्पीच या हेट क्राइम में शामिल पाया जाता है तो संगठन पर भी मुकदमा चल सकता है और संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारी, लीडर या सदस्य भी दोषी माने जा सकते हैं

क्या-क्या अपवाद (Exemptions) हैं?

हलांकि इस कानून में कुछ अपवाद भी है. विधेयक के अनुसार यह कानून निम्न परिस्थितियों को हेट स्पीच नहीं मानता

  • कला, साहित्य, शिक्षा, शोध के उद्देश्य से किया गया कार्य
  • पत्रकारिता और सार्वजनिक हित में की गई रिपोर्टिंग
  • धार्मिक या सांस्कृतिक विरासत से संबंधित सामग्री
  • पब्लिक गुड यानी समाजहित में किया गया संवाद

लेकिन शर्त यह है कि कंटेंट नफरत फैलाने या हिंसा भड़काने वाला न हो.

किन मुद्दों पर उठे सवाल?

सरकार के इस निर्णय पर कुछ नागरिक समूहों और कानूनी विशेषज्ञों ने चिंताएँ जताई हैं. उनका सवाल है कि घृणा या उद्देश्य की परिभाषा सुब्जेक्टिव हो सकती है. सोशल मीडिया निगरानी से अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रभावित हो सकती है और राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका भी है. इसके साथ साथ पुलिस को अधिक शक्ति मिलने पर मनमानी कार्रवाई की संभावना भी है. हालांकि सरकार का कहना है कि इन प्रावधानों का उद्देश्य केवल सांप्रदायिक तनाव रोकना है और इसके लिए नियम स्पष्ट रखे गए हैं.

यह बिल क्यों महत्वपूर्ण?

यह बिल देश में हेट स्पीच के लिए पहला व्यापक राज्य कानून बनने जा रहा है.सोशल मीडिया पर फैलने वाली नफरत के लिए स्पष्ट नियम तय करता है और डिजिटल और फिजिकल दोनों तरह के घृणा फैलाने वाले अपराधों को कवर करता है. इसके साथ संगठनों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक जवाबदेही बढ़ाता है

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