lalu yadav : लालू प्रसाद यादव को मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा, जब अदालत ने लैंड फॉर जॉब मामले को रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के दौरान जस्टिस रविंदर दुदेजा ने स्पष्ट कहा कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है. यादव ने 2022 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा दर्ज एफआईआर, आरोपपत्रों और ट्रायल कोर्ट द्वारा लिए गए संज्ञान को रद्द करने की मांग की थी. इससे पहले भी हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था.
धारा 17A पर अदालत का रुख
याचिका में लालू यादव के वकील ने तर्क दिया था कि सीबीआई ने एफआईआर दर्ज करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत आवश्यक सरकारी अनुमति नहीं ली. यह प्रावधान 2018 के संशोधन के बाद लागू हुआ था और लोक सेवकों के खिलाफ जांच से पहले पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करता है. हालांकि अदालत ने माना कि धारा 17A भावी (prospective) है और 2004–2009 के बीच हुए कथित अपराधों पर लागू नहीं होती. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व स्वीकृति का अभाव एफआईआर, जांच या संज्ञान आदेशों को अमान्य नहीं बनाता. मामले में यह भी सामने आया कि कथित घटनाएं 2004 से 2009 के बीच की हैं, जबकि एफआईआर लगभग 14 साल बाद 2022 में दर्ज की गई .
क्या है लैंड फॉर जॉब मामला?
सीबीआई के आरोपों के अनुसार लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए रेलवे में ग्रुप-डी नौकरियों के बदले लोगों से जमीन ली. आरोप है कि नौकरी चाहने वालों या उनके रिश्तेदारों ने पटना सहित विभिन्न स्थानों पर यादव के परिवार के सदस्यों या उनसे जुड़ी संस्थाओं को कम कीमत पर जमीन बेची या उपहार में दी. सीबीआई का कहना है कि ये नियुक्तियां बिना किसी सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया के की गईं. वहीं लालू प्रसाद यादव ने सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है. दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब लैंड फॉर जॉब मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही जारी रहेगी, जिससे आने वाले समय में इस केस की सुनवाई और तेज होने की संभावना है.