Maha Kumbh 2025: बोलचाल में ही नहीं खानपान में भी है राम का नाम, यहां साधु-संत करते हैं कोडेड भाषा का प्रयोग

पटना। महाकुंभ 2025 (Maha Kumbh 2025) न केवल अपनी भव्यता और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ आने वाले साधु-संतों की एक विशेष भाषा भी आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। यह भाषा आम आदमी के लिए समझना आसान नहीं है, क्योंकि यह एक कोडेड भाषा है, जो विशेष रूप से 13 अखाड़ों के साधु-संतों के बीच उपयोग होती है।

खाने-पीने की वस्तुओं में राम का नाम

इस भाषा में, खाने-पीने की वस्तुओं के नाम को विशेष तरीके से बदला गया है। उदाहरण के लिए, आटे को “भस्मी”, दालों को “पानीयारम”, करी को “पितनवारी”, लहसुन को “पाटल लोंग”, नमक को “रामरस”, मिर्च को “लंकाराम”, प्याज को “लड्डुराम”, घी को “पानी” और रोटी को “रोटी राम” कहा जाता है।

श्रीपंचदशनम जूना अखाड़ा की महामंडलेश्वर योगेश्वरी याती का कहना है, “अच्छा भोजन बिना नमक के बेकार होता है, ठीक वैसे ही जीवन में राम के बिना कोई रुचि नहीं होती।(Maha Kumbh 2025) इसलिए हम नमक को ‘रामरस’ कहते हैं।” वे आगे बताती हैं कि चावल को “महाप्रसाद”, सब्जियों को “सबजीराम”, पानी को “जलराम” और एक साथ खाना परोसने को “पराखन” कहा जाता है।

इन शब्दों के इस्तेमाल पर पाबंदी

इस भाषा का एक और खास पहलू यह है कि इसमें कुछ शब्दों का उपयोग वर्जित है। उदाहरण के लिए, सामान्य भाषा में फल को “कट” करना कहा जाता है, लेकिन अखाड़ों में इसे “विभाजित” किया जाता है, क्योंकि सनातन धर्म में हिंसा का समर्थन नहीं किया जाता।

शब्दों से जुड़ा है पौराणिक मान्यता

मिर्च को “लंका” कहने के पीछे भी एक दिलचस्प पौराणिक कहानी है। अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी बताते हैं, “पौराणिक कथाओं में लंका राक्षसों का स्थान माना गया है, और हनुमान जी ने राम के भक्त होते हुए लंका को आग लगा दी थी। उसी तरह मिर्च भी पेट में आग लगा देती है, इसीलिए इसे ‘लंका’ कहा जाता है।”

आटे को “भस्म” कहने का कारण भी प्रतीकात्मक है। स्वामी यतींद्रानंद गिरी कहते हैं, “भस्म का रंग थोड़ा अलग होता है, और यह उन चीजों (Maha Kumbh 2025) के लिए उपयोग किया जाता है जिनका अस्तित्व समाप्त हो गया है।”

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