Rahul Gandh : भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने गुरुवार को लोकसभा में कांग्रेस नेता और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ एक सबस्टेंटिव मोशन (Substantive Motion) का नोटिस सौंपा. इस प्रस्ताव में उन्होंने मांग की है कि राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द की जाए और उन पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाए. दुबे का कहना है कि motion में उन्होंने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी विभिन्न विदेशी संगठनों जैसे Soros Foundation, USAID और Ford Foundation के साथ विदेश यात्राओं के माध्यम से देश को गुमराह कर रहे हैं और एंटी-इंडिया ताकतों के साथ सहयोग कर रहे हैं. Nishikant Dubey द्वारा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi के खिलाफ भ्रामक जानकारी देने के आरोप में ठोस (सब्सटेंटिव) प्रस्ताव लाने की नोटिस दिए जाने के बाद इसको लेकर हलचल तेज हो गई है. यह प्रस्ताव क्या होता है, इसकी प्रक्रिया क्या है और पहले किन मामलों में इसका इस्तेमाल हुआ है, इन सभी सवालों पर राजनीतिक और संसदीय हलकों में चर्चा तेज है.
क्या होता है सबस्टेंटिव मोशन ?
सबस्टेंटिव मोशन एक विशेष संसदीय प्रक्रिया है, जो सदन में किसी गंभीर मुद्दे पर बहस और निर्णय लेने के लिए लाया जाता है. यह एक स्वतंत्र प्रस्ताव होता है, जिसका परिणाम संसद के निर्णय पर सीधा असर डाल सकता है. संसदीय प्रक्रिया के विशेषज्ञ एम.एन. कौल और एस.एल. शकधर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट में लिखते हैं कि सब्सटेंटिव मोशन एक स्वतंत्र और स्वायत्त प्रस्ताव होता है, जिसे सदन की स्वीकृति के लिए इस तरह तैयार किया जाता है कि वह सदन के निर्णय को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सके. प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट के अनुसार लोकसभा में निम्नलिखित प्रस्ताव इसके उदाहरण माने जाते हैं…
- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव के लिए प्रस्ताव
- राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव
- जन महत्व के मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव
- सामान्य लोकहित के विषय पर चर्चा के लिए प्रस्ताव
- मंत्रिपरिषद के प्रति विश्वास/अविश्वास प्रस्ताव
- अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव
- किसी सदस्य की सीट रिक्त घोषित करने का प्रस्ताव
- सब्सटेंटिव मोशन के लिए क्या होती है प्रक्रिया?
सब्सटेंटिव मोशन लाने के लिए संबंधित सदस्य को पूर्व सूचना देनी होती है. प्रस्ताव वही सदस्य पेश कर सकता है जिसने नोटिस दिया हो. हालांकि यदि प्रस्ताव किसी मंत्री के नाम पर हो, तो उसे कोई अन्य मंत्री भी उनकी ओर से पेश कर सकता है. चूंकि निशिकांत दुबे मंत्री नहीं हैं, इसलिए यदि अध्यक्ष अनुमति देते हैं तो उन्हें स्वयं प्रस्ताव पेश करना होगा. महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्यक्ष/उपाध्यक्ष के चुनाव और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को छोड़कर अन्य किसी भी सब्सटेंटिव मोशन के लिए अनुमोदन (सेकेंडिंग) की आवश्यकता नहीं होती. प्रस्ताव रखने वाले सदस्य को जवाब देने का अधिकार भी प्राप्त होता है.
पहले कब-कब हुआ इस्तेमाल?
1. 2005 का ‘कैश फॉर क्वेरी’ मामला
2005 में एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में ‘कैश फॉर क्वेरी’ कांड सामने आया था. आरोप था कि कुछ सांसद पैसे लेकर संसद में प्रश्न पूछ रहे थे. उस समय लोकसभा अध्यक्ष ने जांच के लिए समिति गठित की. समिति की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन नेता सदन Pranab Mukherjee ने प्रस्ताव रखा कि दोषी पाए गए 10 सांसदों को लोकसभा से निष्कासित किया जाए. सदन ने प्रस्ताव पारित कर सभी 10 सदस्यों को बाहर कर दिया.
2. MPLADS में अनियमितता (2006)
दिसंबर 2005 में सांसद निधि (MPLADS) के कार्यान्वयन में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आए. जांच समिति की रिपोर्ट के बाद मार्च 2006 में प्रस्ताव लाकर कुछ सांसदों को फटकार लगाई गई और निलंबित किया गया. सदन ने प्रस्ताव को मंजूरी दी.
3. बाबूभाई कटारा मामला (2008)
Babubhai Katara को अपनी पत्नी और पुत्र के पासपोर्ट का दुरुपयोग कर दो लोगों को विदेश ले जाने की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जांच समिति की रिपोर्ट के बाद 2008 में प्रस्ताव लाकर उन्हें लोकसभा की सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया.
4. न्यायाधीशों के खिलाफ प्रस्ताव
1991 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश V. Ramaswami के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया. जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया, लेकिन 1992 में लोकसभा में यह प्रस्ताव आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका और गिर गया. इसके बाद 2009 में Soumitra Sen के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया. जांच समिति ने उन्हें दोषी ठहराया. 17 अगस्त 2011 को राज्यसभा ने विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दिया. हालांकि लोकसभा में मामला आने से पहले ही उन्होंने 2 सितंबर 2011 को इस्तीफा दे दिया.
मौजूदा मामले में क्या होगा आगे?
निशिकांत दुबे द्वारा दिए गए नोटिस पर अब सबकी नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर है. यदि अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं और चर्चा की अनुमति देते हैं, तो सदन में इस पर व्यापक बहस होगी. प्रस्ताव लाने वाले सदस्य को जवाब देने का अधिकार होगा, जिसके बाद सदन निर्णय लेगा. यह स्पष्ट है कि सब्सटेंटिव मोशन केवल एक राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि एक गंभीर संसदीय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य सदन के माध्यम से संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना है. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह प्रस्ताव किस दिशा में जाता है और सदन का रुख क्या रहता है.
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद
भाजपा ने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी ने सरकार, संसद और संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले बयान दिए हैं, इसलिए यह कदम आवश्यक है. इस मामले पर लोकसभा में हंगामा भी हुआ, बजट सत्र के दौरान विपक्ष और सरकार के बीच तीखी बहस देखने को मिली. राहुल गांधी ने मीडिया से प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे लगातार कोडवर्ड के आधार पर खबरें चलाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसे उन्होंने अभिनेता निर्देशित बयान बताया. सबस्टेंटिव मोशन एक गंभीर संसदीय उपकरण है, यदि यह अपनाया जाता है और सदन में बहुमत से पारित होता है, तो किसी सांसद की सदस्यता पर प्रभावी कार्रवाई संभव है, हालांकि प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है. इस तरह के प्रस्तावों का उपयोग पहले भी संसद में सदस्यों के खिलाफ किया गया है.