Pm modi speech : पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा संकट के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi ने संसद में देश को संभावित चुनौतियों के लिए तैयार रहने का संदेश दिया है. अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में उन्होंने कोविड-19 काल का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को फिर से धैर्य, संयम और एकजुटता के साथ परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि हालात चिंताजनक तो हैं, लेकिन घबराने की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कहा कि वैश्विक परिस्थितियों का असर लंबे समय तक बना रह सकता है, इसलिए देश को तैयार रहना होगा.
ऊर्जा सुरक्षा पर सरकार की तैयारी
पीएम मोदी ने ऊर्जा संकट से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि भारत के पास 53 लाख मीट्रिक टन से अधिक का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है जिसे 65 लाख मीट्रिक टन से अधिक करने की प्रक्रिया जारी है. भारत के ऊर्जा आयात के स्रोत 27 से बढ़कर 41 देशों तक बढ़ चुका है और एथेनॉल ब्लेंडिंग 1% से बढ़कर लगभग 20% तक पहुंच गया है. इन कदमों के चलते भारत ने पिछले एक साल में लगभग 4.5 करोड़ बैरल तेल आयात कम किया.
हालांकि सरकार ने यह माना कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण गैस और तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. सरकार ने घरेलू एलपीजी को प्राथमिकता दी है, जबकि कमर्शियल गैस सप्लाई सीमित की गई. जिसके कारण घरेलू गैस बुकिंग अंतराल बढ़ाया गया, कई जगहों पर गैस की कमी और लंबी कतारें देखी गई. होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर पर भी असर देखने को मिला. प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि आने वाले गर्मी के मौसम में बिजली की मांग बढ़ेगी. हालांकि फिलहाल पावर प्लांट्स में पर्याप्त कोयला उपलब्ध है.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट का केंद्र
इस संकट के बीच Strait of Hormuz के बंद होने से वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है और भारत को कच्चा तेल $156 प्रति बैरल तक खरीदना पड़ा, टैंकरों की आवाजाही बाधित हुई और इसके साथ साथ सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ा. उधर ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर उसके तटों या द्वीपों पर हमला हुआ, तो वह पूरी फारस की खाड़ी में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा सकता है. जिसके कारण फ्लोटिंग माइंस सबसे बड़ा खतरा हो सकता है और पूरी समुद्री ट्रैफिक ठप होने की आशंका है. तनाव के कारण वैश्विक व्यापार पर गंभीर असर पड़ेगा.
भारत पर संभावित असर
विशेषज्ञों के अनुसार अगर युद्ध लंबा चला तो भारत पर कई स्तरों पर असर पड़ सकता है. जैसे
- तेल, गैस और एलपीजी सप्लाई बाधित
- इंटरनेट केबल्स को खतरा
- प्लास्टिक और पॉलीमर की कीमतों में 60-70% वृद्धि
- दवाओं के कच्चे माल की कमी
- उर्वरकों की सप्लाई प्रभावित
- शिपिंग और बीमा लागत में भारी बढ़ोतरी
ऐतिहासिक स्तर पर वैश्विक ऊर्जा संकट
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार फिलहाल तेल सप्लाई में 11 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी देखी जा रही है. एलएनजी सप्लाई में 140 बिलियन क्यूबिक मीटर की गिरावट आई है और 9 देशों में 40 पावर प्लांट प्रभावित हुए हैं. यह संकट 1973 और 1979 के तेल संकट से भी बड़ा माना जा रहा है.