Relationship between BJP and RSS :बिगड़ते रिश्तों को ठीक करने की कोशिश में जुटी है भाजपा…ये जवाब है उस प्रश्न का जिसकी तलाश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को बड़े लंबे समय से हैं…बिना किसी भूमिका के आपको बताते हैं…आखिर चल क्या रहा है…संघ और भाजपा के बीच कौन सी खिचड़ी पक रही…प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को एक लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत की जमकर प्रशंसा की बीते एक महीने में यह दूसरी बार था जब प्रधानमंत्री ने भागवत की प्रशंसा की. इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के भाषण में संघ की राष्ट्र सेवा के लिए पीएम ने प्रशंसा की थी. इन दोनों घटनाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी एक साक्षात्कार में कहा था कि आरएसएस से जुड़ा होना कोई नकारात्मक बात नहीं है.
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा संघ का महिमामंडन करना कोई नई बात तो है नहीं लेकिन फिर भी इसको लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. खासकर पार्टी अध्यक्ष द्वारा संघ और भाजपा के बीच रिश्तों को लेकर दिए गए बयानों के बाद. दरअसल लोकसभा चुनाव 2024 से पहले भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा था कि पार्टी अब संघ की संगठनात्मक ताकत पर इतनी निर्भर नहीं है. नड्डा का यह बयान संघ को इतना खटका कि भाजपा को लोकसभा चुनावों में ना सिर्फ कम बहुमत मिला बल्कि पार्टी को तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा. यह परिणाम दोनों संगठनों के रिश्तों को उजागर करते नजर आए.
इन सब के बीच यह सब इशारा करता है कि भाजपा पिछले साल लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी और संघ के बीट आई तनाव की खबरें को सकारात्मक एंगल देते हुए अपने वैचारिक मातृ संगठन संघ के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है. हालांकि ये सब एकतरफा नहीं हैं…इन सबके बाद कुछ हफ़्ते में मोहन भागवत ने भी एक सार्वजनिक भाषण में कहा कि एक सच्चा सेवक काम करते हुए मर्यादा बनाए रखता है… जो मर्यादा बनाए रखता है, वह अपना काम करता है, लेकिन अनासक्त रहता है. इसमें कोई अहंकार नहीं है कि मैंने यह किया. ऐसा व्यक्ति ही सेवक कहलाने का हकदार है. जानकार बताते हैं कि संघ प्रमुख का यह बयान भाजपा नेतृत्व के लिए एक संदेश था, जो यह संकेत देता था कि संघ और भाजपा के बीच आपसी समझदारी के प्रयास जारी हैं. जिसका नतीजा हुआ कि इसके बाद महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने यह साबित कर दिया कि संघ का चुनावी प्रबंधन अब भी प्रभावी है. जिसके बिना भाजपा दिक्कतों में आ जाती हैं…
यह सारी चर्चाएं और बयान इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भाजपा अपने राजनीतिक विस्तार की योजना बनाते हुए भी संघ परिवार में अपनी जड़ें पुनः स्थापित करना चाहती है. एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा कि कुछ बयानों की गलत व्याख्या के कारण कुछ अनावश्यक मतभेद पैदा हुए थे. आपको यह समझना होगा कि आरएसएस और भाजपा अलग नहीं हैं. हमारा लक्ष्य एक ही है. हमें कोई अलग नहीं कर सकता. नेतृत्व इस बात पर जोर दे रहा है कि पार्टी और संघ का उद्देश्य एक ही है. हाल के बयान इस संदेश को जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं तक पहुँचाने में मदद करेंगे. एक आरएसएस नेता ने भी कहा कि बड़े परिवार में टकराव होते रहते हैं. संघ और भाजपा के रिश्ते भी इसी तरह के हैं. संघ भाजपा को निर्देश नहीं देता, लेकिन अगर हमें लगता है कि चीजें हमारे मूल सिद्धांतों से भटक रही हैं,तो हम उन्हें चेतावनी ज़रूर देते हैं. सत्ता का एक स्वभाव होता है,जो कभी-कभी लोगों को संवेदनाहीन और संवादहीन बना सकता है. जब ऐसा होता है,तो हम बोलते हैं. हम मानते हैं कि व्यक्ति सुई है और विचारधारा धागा. धागे के बिना सुई कपड़े में सिर्फ़ छेद करती रहती है.