वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर….ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कौन थे विनोद कुमार शुक्ल ?

Vinod Kumar Shukla News : छत्तीसगढ़ के सुविख्यात कवि, कथाकार और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार शाम 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वे पिछले कुछ महीनों से अस्वस्थ थे और रायपुर एम्स में उनका इलाज चल रहा था. उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर है. साहित्यकारों, पाठकों और उनके असंख्य प्रशंसकों ने इसे एक अपूरणीय क्षति बताया है.विनोद कुमार शुक्ल का जाना ऐसे समय में हुआ है, जब एक महीने पहले ही उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वे ज्ञानपीठ पाने वाले छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार थे. सम्मान समारोह के दौरान ज्ञानपीठ के महाप्रबंधक आरएन तिवारी ने उन्हें वाग्देवी की प्रतिमा और पुरस्कार राशि का चेक सौंपा था. उस अवसर पर भी शुक्ल की सादगी, विनम्रता और भाषा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता साफ झलकती थी.

हर किसी से एक किताब लिखने की उम्मीद

अपने जीवन अनुभवों पर बात करते हुए विनोद कुमार शुक्ल ने कई बार कहा था कि असफलताएं, गलतियां और आलोचनाएं जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन उसी बिखराव में कहीं न कहीं अच्छाई भी छिपी होती है. उनका मानना था कि उम्मीद ही जीवन की सबसे बड़ी ताकत है. वे कहते थे,जब कहीं किसी का साथ न मिले, तब भी चलो अकेले चलो. मेरे लिए लिखना और पढ़ना सांस लेने की तरह है.उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता सबके साथ का पाठ करते हुए मनुष्य के भीतर मौजूद सामूहिक संवेदना और साझी मनुष्यता को शब्दों में ढाला. उनका यह कथन भी अक्सर उद्धृत किया जाता रहा कि हर मनुष्य को अपने जीवन में एक किताब जरूर लिखनी चाहिए.

नई पीढ़ी से उम्मीद

लंबे समय तक बच्चों और किशोरों के लिए भी लेखन करने वाले विनोद कुमार शुक्ल को नई पीढ़ी से खास उम्मीदें थीं. वे कहते थे कि अच्छी किताबें हमेशा साथ रखनी चाहिए और किसी भी क्षेत्र में शास्त्रीयता हासिल करने के लिए उस क्षेत्र के श्रेष्ठ साहित्य से जुड़ना जरूरी है. भाषा और विचारधाराओं पर मंडराते संकट के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट कहा था कि किसी भाषा या अच्छे विचार का नष्ट होना, दरअसल मनुष्यता का नष्ट होना है. उन्हें भरोसा था कि आने वाली पीढ़ी हर भाषा और हर विचारधारा का सम्मान करेगी.

भारतीय साहित्य जगत को बड़ा झटका… ज्ञानपीठ सम्मानित लेखक विनोद कुमार शुक्ल का निधन

आलोचना पर उनकी सोच

आलोचना को लेकर भी शुक्ल की दृष्टि बेहद सरल लेकिन गहरी थी. उनका कहना था कि अगर किसी अच्छे काम की आलोचना होती है, तो वही आलोचना आगे चलकर आपकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. कविता को लेकर वे कहते थे,कविता की सबसे अच्छी आलोचना है एक और बेहतर कविता लिख देना.

साहित्यिक योगदान

1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल आधुनिक हिंदी साहित्य की विशिष्ट आवाज थे. उनकी रचनाओं में साधारण जीवन की असाधारण संवेदना दिखाई देती है. कविता, कहानी और उपन्यास तीनों विधाओं में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. उनकी कृतियों पर आधारित फिल्मों ने भी व्यापक सराहना पाई. उन्हें गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, रजा पुरस्कार, वीरसिंह देव पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया.

साहित्य जगत में शोक की लहर

विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर साहित्य जगत की तमाम हस्तियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की है. लेखकों और कवियों का कहना है कि शुक्ल की भाषा, दृष्टि और मानवीय संवेदना आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी. उनका साहित्य, उनकी सोच और उनके शब्द हिंदी साहित्य में हमेशा जीवित रहेंगे.

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