Navagraha Temple : मध्य प्रदेश के उज्जैन में, शिप्रा नदी के पास त्रिवेणी घाट किनारे स्थित नवग्रह शनि मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है. काशी के बाद उज्जैन को ऐसी नगरी माना जाता है जहां भगवान शिव के साथ-साथ मां भगवती और शनि देव का आशीर्वाद भी एक साथ प्राप्त होता है.
पिंडी रूप में विराजमान हैं शनिदेव
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां शनिदेव पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं. आमतौर पर शनि की प्रतिमा काले रंग की होती है, लेकिन इस मंदिर में स्थापित मूर्ति का रंग भगवा है, जो प्रथम दृष्टया हनुमान जी की प्रतिमा जैसी प्रतीत होती है. गर्भगृह में स्थित पिंडी पर निरंतर तेल टपकता रहता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, शनिदेव के इस रूप को भगवान शिव का अवतार माना जाता है.
नवग्रहों का भी मिलता है आशीर्वाद
करीब 2000 वर्ष प्राचीन माने जाने वाले इस मंदिर में शनिदेव के साथ नवग्रहों की भी पूजा की जाती है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां दर्शन और अनुष्ठान कराने से नवग्रहों के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं. विशेष रूप से जिन लोगों पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही होती है, वे यहां ‘दशा पूजन’ कराने पहुंचते हैं. मान्यता है कि इससे शनि की वक्र दृष्टि का प्रभाव कम होता है.
अमावस्या और शनिवार को उमड़ती है भीड़
शनिवार और अमावस्या के संयोग पर मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. स्थानीय परंपरा के अनुसार, जो भक्त किसी शारीरिक या मानसिक कष्ट से गुजर रहे होते हैं, वे मंदिर परिसर में चप्पल और वस्त्र छोड़ जाते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने से कष्टों से मुक्ति मिलती है. मंदिर परिसर में एक प्राचीन पीपल का पेड़ भी स्थित है. श्रद्धालु यहां धागा बांधकर अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने पर इच्छाएं पूर्ण होती हैं.
राजा विक्रमादित्य से जुड़ा है निर्माण
स्थानीय कथाओं के अनुसार, मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में विक्रमादित्य ने कराया था. वर्तमान में मंदिर का मूल ढांचा छोटा है, हालांकि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बाहरी हिस्से को शेड से ढक दिया गया है. धार्मिक मान्यताओं और विशिष्ट परंपराओं के कारण उज्जैन का यह नवग्रह शनि मंदिर देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है.